Wednesday, December 16, 2020

क्योंकि जगह भी एक आवाज है (कवि मंगलेश डबराल के लिए)

 


१६ अप्रैल २०१२ को इंस्टीटूटो सर्वेंट्स, दिल्ली में श्री मगलेश डबराल और स्पेन के एक अन्य कवि (नाम याद नहीं आ रहा) के कविता पाठ के समय उनके संग ली गयी एक तस्वीर

१६ अप्रैल २०१२ को इंस्टीटूटो सर्वेंट्स, दिल्ली में श्री मगलेश डबराल और स्पेन के एक अन्य कवि (नाम याद नहीं आ रहा) के कविता पाठ के समय उनके संग ली गयी एक तस्वीर 
 

२०१४ में लिखी और ‘हिंदीसमय’ पर प्रकाशित इस कविता को डबराल साहब ने पसंद किया था। यह कविता उन्हें ही समर्पित किया था क्योंकि उनकी सुप्रसिद्ध कविता ‘क्योंकि आवाज़ भी एक जगह है’ के तर्ज़ पर लिखी थी यह कविता और इसमें कुछ दीगर कहने की चेष्टा की थी। आज डबराल साहब की अनुपस्थित में और उनकी स्मृति में उन्हें पुन: समर्पित कर रहा हूँ।

———
क्योंकि जगह भी एक आवाज है
(कवि मंगलेश डबराल के लिए)
बात सही है
आवाज भी एक जगह है
क्यूँकि आपकी आवाज के अनुपात में ही
यह तय होता है कि
कितनी, कैसी, कहाँ और कब तक
आपको जगह मिलेगी
अगर कहीं किसी की आवाज दब गई
तो मानो एक कोई नई जगह
जो तैयार हो रही थी
वो बनते बनते रह गई
समुद्र की गहराइयों में
पृथ्वी के तहखानो में
बदहवास सी दौड़ती-भागती
जिंदगी की तन्हाइयों में
ऐसे कई शब्द मौन हैं
जिन्हें कोई जगह
अभी तक नहीं मिल पाई है
क्योंकि उनका आवाजों में तब्दील होना
अभी भी बाकी है
शायद इसीलिए भी क्यूँकि
जगह भी एक आवाज है
जिनका होना न जाने
किस नए युग का आगाज हो
तभी तो हर रंग के कट्टरपंथियों का
सबसे बड़ा सपना होता है
पूरी धरती हड़प कर उनपर खुद सोना
ताकि एक टुकड़ा जमीन
एक मद्धिम आवाज भी
न बच पाए उनके लिए
जो कोई बीच की जगह ढूँढ़ते-बनाते हैं
कोई मध्यम मार्ग
जिसके सहारे
इतिहास के साझा गलियारों में
किसी एक बुद्ध, एक कबीर,
एक दारा शिकोह, एक गांधी की आवाज
गूँजती रहती है
जिन्हें भिक्षा में
कोई सड़ा हुआ मांस का टुकड़ा दिया जा सकता है
या फिर काशी से निष्कासित किया जा सकता है
सर कलम कर बोलती बंद की जा सकती है
या गोलियों से छलनी कर
शरीर खत्म किया जा सकता है
लेकिन जिनकी आवाज गाहे-बगाहे
रात के अंधियारे में किसी कोने से आती रहती है
मानो कहते हुए 'जागते रहो, जागते रहो"
एक ऐसी सदा
जिसे कोई भी जगह देना
खतरे से खाली नहीं।
--कुमार विक्रम
Image may contain: text that says "3:29 Back क्योंकि जगह भी एक आवाज़ है Messages 2014-10-25 18:57 GMT+05:30 Mangalesh Dabral <mangalesh.dabral@.gmail.com>: प्रिय विक्रम, आपकी कविता पसंद आयी. एक नया आयाम है इसमें और जगह को ऐतिहासिक- राजनीतिक नज़र से देखा गया है. नमस्ते. मंगलेश. 2014-10-22 15:27 GMT+05:30 Kumar Vikram <author73@gmailcom>: क्योंकि जगह भी एक आवाज़ है (कवि मंगलेश डबराल के लिए) बात सही है आवाज़ भी एक जगह है क्यूंकि आपकी आवाज़ के अनुपात मेंही यह तय होता है कि कितनी, कैसी, कहाँ और कबतक आपको जगह मिलेगी"
Vyomesh Shukla, Pankaj Chaturvedi and 16 others
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