Friday, July 26, 2019

चंद्रयान--एक कविता







चंद्रयान 

तुम्हें वहां पानी मिले न मिले 
थोड़ी नमी ज़रूर लेते आना 

चाँदनी से भेंट हो न हो
थोड़ी शीतलता ज़रूर ले आना

चाँद पागल सा दिखे न दिखे 
थोड़ी दीवानगी ज़रूर ले आना 

वहां कोई धब्बा दिखे न दिखे
पृथ्वी के कुछ धब्बे छोड़ आना

वहां से शायद ही कोई आये हमें भुलावा देने 
तुम इस समय की विस्मृतियाँ वहीं छोड़ आना

चाँद स्वयं अन्धकार में डूब प्रतिबिंबित रौशनी में है चमकता   
यह देख तुम कुछ गरूर वहीँ छोड़ आना 

---कुमार विक्रम 

Thursday, July 25, 2019

एक छोटी कविता






एक छोटी कविता  



प्यार जीवन है जीवन भ्रम है पर प्यार भ्रम नहीं है जीवन से पहले और बाद भी प्यार रहता हरदम है

-कुमार विक्रम 



Monday, July 15, 2019

An Icecube-A Poem




An Icecube



Moulded out of an element
through a chilling process
it dissolves
gets melted down
is gradually submerged
and annihilated
and assimilated
wholly, fully,
substantially
in a goblet of wine
to make the pick-me-up
more tasteful
more wholesome
more of a worthwhile
experience
like a saint
making the world
a better place
after having endured
the tortuous self-disciplining process
and hardened himself
peacefully,
coolly, calmly dissolves into
the wine of life—
becoming invisible
yet omnipresent,
one with elements
flowing eternally with
eternity.
Saintly icecube!
I dare not aspire to be
your frighteningly
unidentified self,
would rather be
in the labyrinth
of self-assertions
to have some minutes
of unmitigated fame
like the models walking on the ramp
under the flickering light
of a kaleidoscopic lamp.
I dare not be
so gentle
cool, unassuming
for it gives me
a sinking feeling
of a stone getting immersed
in a pool.
Published in 'The Asian Age', New Delhi, 2000

Saturday, June 22, 2019

प्राईवेट जोक (एक कविता)




यह कवितानया ज्ञनोदयके सितंबर २००८ अंक में प्रकाशित हुई थी। लेकिन उस अंक की प्रति कहीं रख गई है और यह कविता खो सी गई थी। आज इसकी हस्तलिखित ड्राफ़्ट मुझे मिल गई जिसमें तारीख़ मई २००६ की लिखी हुई है। ड्राफ़्ट स्तर पर इसे मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी विष्णु खरे साहब ने इस कविता को देखा था। यह कविता मेरे बहुत ही क़रीब है। 

यहाँ ऐसे दुख की बात की गई है जो इतना प्रगाढ़ और चिरकालिक है किसी दूसरे के लिए उसके तह में जाना नामुमकिन है और उसके बारे में पूछ-ताछ करना या ताका-झाकी करना उस दुख की गरिमा को कम करता है और उसे ठेस भी पहुँचाता है। 

हम चुपचाप उसके इर्द गिर्द घूम सकते हैं और कुछ सूक्ष्म तरीक़े से ही कुछ मदद करने की कोशिश कर सकते हैं। यह दुख उस प्राईवेट जोक (private joke) की तरह है जो सिरफ उन्हें समझ आएगा जो उस जोक के बनते हुए तात्कालिक क्षण में मौजूद थे क्योंकि उसकी कोई भी व्याख्या फूहड़ ही होगी। 
———-
प्राईवेट जोक

किसी से उसके दुख के बारे में पूछना
एक तरकीब अच्छी है
उसके दुख में शामिल होने की

घाव से मवाद निकालने की कला
बेहतर है
माहिर डॉक्टर या नर्स के लिए 
छोड़ दी जाए
क्यों तुम अपनी ईजाद की हुई दवा
मरहम-पट्टी चाक़ू छुरी लेकर
उसके दुख को कुरेदना चाहते हो

अस्पताल के वार्ड बॉए रिसेपशनिस्ट 
पोछा लगाती कामवाली को देखो
जो दुख के आसपास घूमते हीं रहते हैं
दुख से पूर्णत: विमुख
बिजली का मिस्तरी 
मरीज़ के कमरे के पंखों को 
ठीक करने आया हुआ है
और मरीज़ का हाल पूछे बग़ैर 
उसके द्वारा चलाए पंखे की हवा ही
एक सुखद संपर्क सूत्र है
उसके और मरीज़ के बीच

मरीज़ से मिलो तो ज़रूर 
पर उस वार्ड बॉए की तरह 
जो मरीज़ को मशगूल रखता है
बीती शाम को हुई बेमौसम बारिश की बातचीत में
या राजनीतिक उठापटक की चीरफाड़ करने में 
या फिर बारहवीं पास किए बच्चे के
किसी कोर्स में एडमिशन की चर्चाओं में

किसी से उसके दुख में पूछना 
एक तरकीब अच्छी है
उसके दुख में शामिल होने की
क्योंकि दुख तो उसका आँगन है
जहाँ हम-तुम चहलक़दमी करते
अच्छे नहीं दिखते

उसके दरवाज़े के बाहर 
बरामदे में ही बैठकर
दूर से धीरे-धीरे 
चाय की चुस्की लेते हुए
हमारा-तुम्हारा बार बार लौटना
उसके दुख की टीस को 
कुछ कम कर सकता है

कुमार विक्रम 

मई २००६

Friday, June 14, 2019

खरे साहब: कुछ नोट्स






(श्री अजेय कुमार द्वारा सम्पादित 'उद्भावना' पत्रिका का अंक १३६ (अप्रैल-जून २०१९) हमारे समय के दिग्गज कवि-आलोचक-अनुवादक-विचारक-पत्रकार-स्तम्भकार- स्क्रिप्ट राइटर - संस्कृति प्रशासक- श्री विष्णु खरे (१९४०-२०१८) पर केंद्रित है. इस अंक में एक लेख मेरा भी है. अगर सही रूप में कहा जाये तो श्री अजेय कुमार ने यह लेख मुझसे लिखवा लिया है क्यूंकि दो महीने की आँख-मिचौली के बाद ही मैं यह लिख पाया--वही पुराण राग मेरा कि फुरसत नहीं निकल पा रहा, कभी यह काम कभी वह काम, कभी यहाँ की दौर और कभी वहां की. साथ ही साथ मन में यह भी था की कुछ अच्छा लिखा जाये, खैर अच्छे-बुरे का तो पता नहीं, लेकिन मैंने उनके साहित्यिक पहलु से अलग जो मुझे उनके साथ काम करने का एक अहम् मौका मिला, उसमे पर ही केंद्रित कर मैंने यह आलेख लिखा. इस अंक में हमारे समय के कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों के लेख सम्मिलित है. उसकी पूरी सूची इस प्रकार है: चंद्रकांत पाटिल, असद ज़ैदी, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, पंकज चतुर्वेदी, हेमंत कुकरेती, सविता सिंह, कात्यायनी, लीलाधर मंडलोई, विजय कुमार, प्रियदर्शन, राजेश जोशी, नीलेश रघुवंशी, कुमार अम्बुज, संजय चतुर्वेदी, जानकीप्रसाद शर्मा, दिनेश श्रीनेत, आनंद स्वरुप वर्मा, परवेज़ अहमद, प्रफुल्ला शिलेदार, रविभूषण, लाल्टू, दिनेश भट्ट, पल्लव, अनीता वर्मा, निशिकांत ठाकर (साक्षात्कार) और हरिमृदुल (साक्षात्कार), सुंदर चंद ठाकुर (कविता) एवं कुछ स्मृतियाँ तथा खरे साहब के कुछ लेख. संपादक अजेयजी को फिर से बधाई. अपना लेख अब यहाँ ब्लॉग पर भी डाल दिया है)                  


खरे साहब: कुछ नोट्स 

अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थी होने के नाते एक ऐसी ट्रेनिंग हुई जिसमें कि आप लेखकों से व्यक्तिगत तौर परबाई डिफ़ॉल्ट बहुत दूर रहते हैं. कभी उनसे मुलाक़ात होगी और आप उनके साथ बातचीत करेंगे ऐसाकभी आप सोचते भी नहीं है. इस ट्रेनिंग को कई अर्थों में लिया जा सकता है लेकिन इसका एक अर्थ यहज़रूर है कि आप लेखकों को सिर्फ़ उनकी लेखनी सेउनकी पुस्तकों से  उनकी रचनाओं सेउनकेविचारों से ही  जानते  समझते हैं और आपका उनसे एक रिश्ता बना रहता है और वो कहीं  कहीं आपकेमन मस्तिष्क में अलग अलग ख़ाकों में रहते हैं। 

हाँ लेकिन उनके कुछ व्यक्तिगत जीवन के बारे में आपको अलग अलग जीवनियों में या लोगों के संस्मरणमें या  कुछ अनेक्डॉट्स के रूप में चीज़ें आपके सामने में आती है तो थोड़ा बहुत ‘व्यक्तिगत’ रूप  में आप उनके बारे में जानते रहते हैं 

जैसे कि मुझे याद है जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य से MA कररहा था (१९९४-९६ के दौरान) तो हमारे एक शिक्षक प्रोफ़ेसर विनोद सेना जो कि हमें टीएस एलियट पढ़ाते थेउन्होंने एक बड़ी अजीब बात  एलियट के बारे में कही। वह यह कि एलियट जब कभी किसी विश्वविद्यालय में व्याख्यान के लिए जाते थे तो किसी पत्रकार की इंटरी की मनाही होती थी और यहाँ तक कि व्याख्यान हॉल के सारे खिड़की दरवाज़े भी बंद करवा देते थे क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि उनके व्याख्यान का कोई भी हिस्सा बाहर प्रकाशित हो ताकि वो अपने व्याख्यान को हूबहू किसी दूसरी जगह इस्तेमाल कर पाएँ। इसमें कहीं न कहीं उनका मौद्रिक पक्ष भी काम करता था, ऐसा प्रोफ़ेसर साहब ने हमें बताया। फिर कभी किसी पुस्तक में ऐसा एलियट के बारे में पढ़ने को नहीं मिला और ज़रूर यह उनके बारे में प्रचलित विभिन्न भ्रांतियों व कहानियों- जो कि किसी भी विशिष्ट साहित्यकार के बारे में प्रचलित रहती है- से संबंधित रहा होगा जिसकी जानकारी प्रोफ़ेसर साहब को रही होगी। 

शायद मई 2006 में विष्णु खरे जी नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादकीय सलाहकार के रूप में आए. दरअसलउस वक़्त एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट हमारे सामने था. फ्रैंकफर्ट बुक फेयर (2006) में भारत अतिथि देश केरूप में शामिल होने जा रहा था और ट्रस्ट उस परोजेक्ट की नोडल एजेंसी थी उसकी तैयारी जोरों शोरों से क़रीब 1 साल से ज़्यादा समय से चल रही थी और मैं उस प्रोजेक्ट का सम्पादकीय इंचार्ज था. कई अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ साथ लेखकों के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी मेरी थी  

खरे साहब संपादकीय सलाहकार के रूप में एक पूरा पैकेज लेकर आए थे। पैकेज इस रूप में कि वो खुद एक नामचीन कवि-साहित्यकार-अनुवादक थे और अंतरराष्ट्रीय पटल पर और अंतरराष्ट्रीय साहित्य की सूझ-बूझ रखने वाले तथा साहित्य एकेडमी में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर कार्य कर चुके थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जर्मनी व वहाँ के भारतीय साहित्य से जुड़े बुद्धिजीवियों से उनका एक ख़ास पुराना रिश्ता था। अंत में यह तथ्य भी अपने आप में महत्वपूर्ण था कि १९८६ में जब फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले में भारत को पहली बार अतिथि देश का दर्जा मिला था तो भारत से गए लेखकों के शिष्टमंडल में वो भी शामिल थे। तो बहुत ही विविध तजुरबे के साथ खरे साहब इस प्रोजेक्ट में शामिल हुए और उनके साथ काम करना मेरे जैसे एक युवा संपादकीय सहायक के लिए एक सुखद मौक़ा व चुनौती भी थी।

लेकिन जैसा कि हमारे प्रोफ़ेसर सेना ने एलियट के बारे में एक अटपटी जैसी सूचना हमें क्लासरूम में दी थी, वैसी सूचना खरे साहब के बारे में मुझे देने वाला कोई नहीं था। यह बाद में जाकर पता चला कि हिंदी साहित्य जगत में लोगों ने कई ऐसे विशेषणों से उन्हें नवाज़ रखा था कि अगर उसकी सूचना मुझे पहले से रहती तो उनके साथ काम करने की बात सुनकर मैं शायद असहज हो गया होता। इस तरह से हम दोनों एक दूसरे को ब्लैंक स्लेट की तरह मिले and we hit off like a great pair! 
—-
अगला छे महीना एक पागलपन व दीवानगी का दौर रहा। क़रीब १०-१२ घंटे रोज़ हम साथ साथ काम करते रहे जिसमें कई शनिवार और रविवार की छुट्टियाँ भी शामिल रहीं। ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रो बिपीन चंद्रा, निदेशक श्रीमती नुज़हत हसन, संयुक्त निदेशक श्री नरेंद्र सिंह रंधावा के साथ हमलोगों ने प्रोजेक्ट से संबंधित न जाने कितने मुद्दों पर गहन चिंतन मनन किया, शायद १५००-२००० ईमेलों का भारत में अन्य संस्थानों, लेखकों, साहित्यकारों, प्रकाशकों, मंत्रालय, जर्मनी में भारतीय दूतावास, फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले प्राधिकरण, जर्मनी में अन्य साहित्यिक संस्थानों आदि से समन्वय हेतु आदान प्रदान हुआ। इन ईमेलों के कई टेक्स्ट पर सोचविचार कर हमलोग लिखा करते थे। ट्रस्ट की तरफ से तक़रीबन ५० लेखकों का शिष्टमंडल फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले में शामिल हुआ जिसमें हमारे समय के कई दिग्गज लेखक शामिल थे, मसलन, महाश्वेता देवी, यू आर अनंतमूरती, विक्रम सेठ, अमिताभ घोष, दिलीप चित्रे, इंदिरा गोस्वामी, शशि थरूर, रमाकांत रथ, सुधीर कक्कर, गुरदयाल सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, अमित चौधुरी सितांशु यशचंदर, शफ़ी शौक़,निदा फ़ाज़ली, ममांग दाई आदि। इसके अलावा साहित्य अकादमी एवं अन्य प्रकाशकों की तरफ से भी कुछ भारतीय लेखक शरीक हुए थे और कहा जाता है कि एक समय में फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले २००६ के दौरान क़रीब १०० भारतीय लेखक विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए जो अपने आप में एतिहासिक रहा। 


In Frankfurt on 10th or 11th October 2006


सबसे बड़ी चुनौती हमारी रही लेखकों के कार्यक्रम कीफॉरमैटिंग व  उनसे मँगवाए गए रीडिंग टेक्स्ट का संचयन ताकि उन्हें जर्मन भाषा में अनुवाद के लिए तैयार करवा लिया जाए। कार्यक्रमों में भारतीय लेखक मुख्यत अपनी भाषा में ही पाठ करते थे और उनके जर्मन भाषा में अनुदित पाठ श्रोताओं के बीच बँटवा दिए जाते थे। यह काफ़ी मशक्क्त का काम था जिसमें हमारी साहित्यिक समझ और लॉजिस्टिक्स का सही समन्वय होना सबसे महत्वपूर्ण था। फ़्रैंकफ़र्ट पहुँच कर लेखकों के साथ व उनके कार्यक्रमों का समन्वय  भी बड़ा काम था जिसे जर्मनी की एक पी आर एजेंसी के सहयोग से बख़ूबी निभाया गया। 

जैसी भ्रांतियाँ खरे साहब के बारे में साहित्यिक हलकों में फैलाई गई थी, उससे बिलकुल दीगर मेरा अनुभव रहा। समय से आना, और काम के प्रेशर को देखते हुए यह मानकर चलना कि शाम में घर जाने का कोई समय नहीं है। एक सलाहकार के रूप में तकनीकी रूप में उनको इतनी लिबरटी थी कि वो एक रेगुलर स्टाफ़ से अलग अपनी दिनचर्या रख सकते थे, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। सरकारी कार्यालय के कामकाजों व नियमों की अच्छी जानकारी थी और साथ ही साथ इसकी समझ भी उसकी सीमाओं के अंदर रहकर भी समयानुसार सही परिणाम देना है। मुझे काम के प्रति उनके इस प्रतिबद्धता से काफ़ी कुछ सीखने को मिल रहा था, हालाँकि वो मुझे अनेक तरह के काम में संलग्न देखने पर कभी कभी अपनी गहरी भारी आवाज़ में पूरी भाव भंगिमा से कहते थे, ‘Kumar, the way you are working is simply out of the world!’ और एक बार मेरे जन्मतिथि को जानकर उन्होंने कहा, ‘अरे तुम तो बिलकुल मेरे बेटे के उम्र के हो’! 
मयूर विहार से उन्हें ग्रीन पार्क आने जाने में दिक्क्त होने लगी। ऑटो काफ़ी किराया ले लेता था। कार्यालय में शाम में देर हो जाने के कारण रात के ८ बजे के बाद ऑफ़िस की गाड़ी एक दो बार उन्हें छोड़ने गई लेकिन नियमानुसार वह सुविधा हमेशा नहीं दी जा सकती थी। खरे साहब कहते थे कि उनकी एक फ़िएट  गाड़ी है जो बॉम्बे में बेटे के पास है और अपनी एक पुरानी स्कूटर को ठीक कराने की समय नहीं निकाल पा रहे थे। लेकिन एक दिन सोमवार की सुबह में उन्होंने मुस्कुराते हुए प्रवेश किया और कहा कि उन्होंने अब स्कूटर ठीक करवा लिया है और आने जाने की समस्या नहीं रहेगी।

 दिन भर के काम में बात आई-गई हो गई। देर शाम में हमलोग कार्यालय से बाहर निकले और जब मैंने देखा कि खरे साहब ने एक पुराने स्कूटर की डिक्की से अपनी हेलमेट निकाली और उसे पहना तो उन्हें देखकर मानो मुझे ऐसा लगा कि वो पल में दिल्ली के आम से भी आमतर व्यक्ति में तब्दील हो गए हों। जब वो स्कूटर पर बैठकर किक मारकर आगे मेन रोड पर हज़ारों गाड़ियों के रेलम पेल में ग़ायब हो गए तो यह सचमुच लगा कि खरे साहब ने जीवन में संघर्ष को इस तरह आत्मसात कर लिया था कि उसका कोई अलग से कोई वजूद नहीं रहा। शायद ही कभी उनको अपनी पारिवारिक व आर्थिक समस्याओं के बारे में आप बात करते हुए पाते। हालाँकि हमारा रिश्ता इतना गहन हो चुका था कि फ़्रैंकफ़र्ट के तीन सप्ताह के प्रवास में रात की गहराइयों और तन्हाईयों में कई बार वो खुले थे जिसकी चर्चा यहाँ करना परासांगिक नहीं है।
शाम में जैसा अमूमन होता ही है हमलोग समोसे खाते थे। ४-४३० के आस पास या उसके कुछ बाद। काम से ब्रेक लेने का कारण भी बनते थे समोसे और चाय। उसी दौरान एक दिन समोसे खाते खाते उन्होंने कहा कि शुगर का टेस्ट कराया था और फिर हँसी में बात बदल दी। मैंने कहा कि तब समोसा कम कर देते हैं। खरे साहब ने अपनी चिरपरिचित अंदाज में कहा ‘अरे, देखा जाएगा।’ 

उन्हीं दिनों एक बार टाईम्स ऑफ़ इंडिया में एक रपट छपी जिसमें यह ज़िक्र था कि समोसा को विश्व के सबसे ज़हरीले स्नैक में एक माना गया है। उस रिपोर्ट में पिज़्ज़ा, बरगर आदि का भी ज़िक्र था। 

दोपहर में खाना खाते हुए मैंने पूछा कि आज आपने टाईम्स में समौसा-संबंधी रिपोर्ट पढ़ी है? उन्हें बात सुनते ही दिलचस्प लगी। हँसते हुए पूछे, ‘अरे, क्या?’ मैंने लाईब्रेरी से पेपर मँगवा कर वह रिपोर्ट खोलकर उनके सामने रख दिया जिसमें साइंस वाले पेज पर बिलकुल उपर में ही लिखा था, ‘ Samosa among the most poisonous snacks of the world’, या फिर ऐसा ही कुछ। वो तुरंत पूरा पढ गए और थोड़ा गंभीर भी हो गए। हमलोगों ने फिर समोसे के बनने की प्रक्रिया पर थोड़ी देर बात-चीत की कि कैसे प्रायः उन्हें उसी पुराने जले हुए तेल में बार-बार तला जाता है जो निश्चिततः स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होता होगा। रिपोर्ट का हम पर गहरा असर पड़ा। उस दिन हमलोगों ने समोसा नहीं खाया। लेकिन एक-दो दिनों के बाद स्वाभाविक रूप से फिर से समोसे हमने खाना शुरू कर दिया। 
एक बार डरते डरते मैंने उन्हें कहा कि मैं कुछ कविताएँ भी लिखता हूँ-अंग्रेज़ी व हिंदी दोनों में। उन्होंने मेरी झिझक को समझ लिया और कहा कि ‘Mangalesh has briefed me about you’! मंगलेश डबराल भी उन दिनों ट्रस्ट में सलाहकार के तौर पर आए थे और उन्होंने मेरी अंग्रेज़ी की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद ‘पहल’ के लिए किया था जिसके लिए मैं आज तक उनका आभारी हूँ। फिर मेरी हिंदी की कुछ कविताएँ एक पत्रिका में छपी और मैंने खरे साहब को झिझकते हुए पढ़ने के लिए दिया। दिनभर बीत गया और उनकी कोई टिप्पणी नहीं आई। दिन का भोजन हम साथ ही करते थे लेकिन उस वक्त भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। मेरी उत्सुकता बढ़ती गई और शाम के क़रीब ५ बजे मैंने पूछ ही लिया, ‘ कविताएँ आप पढ पाए क्या?’ उन्होंने कहा, ‘ वो तो मैंने सुबह में ही पढ ली थी!’ मैंने पूछा, ‘कुछ है उनमें?’ खरे साहब ने कहा, ‘ है! बिल्कुल है!’ फिर हँसते हुए कहा कि बड़ी अजीब बात है कि जिन लोगों ने खरे की कविताएँ नहीं पढ़ी हैं उनपर भी कुछ प्रभाव है!’ कविताएँ मेरी गद्यातमक धारा की थी और शायद इसीलिए उन्होंने ऐसा कहा। उसके बाद कविताओं पर उनकी टिप्पणी आती रहती थी। एक बार ‘जनसत्ता’ मेरी दो कविताएँ प्रकाशित हुई जिन्हें उन्होंने पढ़ा और ईमेल पर ये शब्द लिखकर भेजे-‘दोनों कविताएँ अच्छी निकाल लाए हो। अंग्रेज़ी में लिखते रहो लेकिन मैं तुम्हारा भविष्य हिंदी में देख रहा हूँ’
ट्रस्ट से जाने के बाद क़रीब १२-१३ वर्षों तक उनसे ईमेल पर लंबी लंबी बात चीत होती रही। उनके साथ एक बार कविता पाठ करने का मौक़ा मिला। दरअसल उन्होंने २००७ में एक ईंडो-एस्टोनियन साहित्यिक समिति का गठन किया और उसकी पहली गोष्ठी एस्टोनिया के प्रसिद्ध कवि यान कापालांसिकी के आगमन पर आईआईसी, नई दिल्ली में अक्टूबर महीने में हुई। उस समिति की कार्यकारिणी में मुझे भी रखा। श्री केदारनाथ सिंह, श्री मंगलेश डबराल, श्री अजय कुमार और खरे साहब उसके संस्थापक सदस्य थे। मैंने दो अंग्रेज़ी की कविताएँ पढ़ीं। देवी प्रसाद मिश्र ने पाठ के बाद बधाई दी और कहा कि काफ़ी सशक्त कविताएँ थीं आपकी! लेकिन सबसे दिलचस्प टिप्पणी खरे साहब से अगली सुबह फ़ोन पर मिली जब उन्होंने कहा कि ‘भई मेरी पत्नी कह रही थीं कि सबसे ज़्यादा उन्हें तुम्हारी कविताएँ पसंद आईं।’ यह अफ़सोस है कि खरे साहब के काफ़ी बार कहने पर भी अपना कोई संग्रह  अब तक नहीं निकाल पाया। 

January 2007 at IIC in New Delhi; seated on dais from left: Vishnu Khare,
Ajey Kumar, Jaan Kapalinski, Mangalesh Dabral; myself reading poems


२५ फ़रवरी-४ मार्च २०१२ के नयी दिल्ली पुस्तक मेले में हमलोगों नस थीम 'भारतीय सिनेमा के १०० वर्ष'को केंद्रित कर रखी थी. इस मौके पर, कई अन्य कार्यक्रमों में 'साहित्य और सिनेमा' विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में ट्रस्ट की तरफ से विष्णु खरे और ज़ुबैर रज़वी के बीच एक संवाद आयोजित करने  का भी मुझे अवसर मिला. 'उद्भावना' के संपादक अजेय कुमार ने इस कार्यक्रम का सञ्चालन किया। साहित्य और सिनेमा के बीच के सामजस्य पर बात होते होते इस पर भी पहुंची की बॉलीवुड सिनेमा ने हिंदी व् उर्दू को सहेज कर रखने और उसे प्रचारित करने में बड़ी भूमिका निभायी। हालाँकि खरे साहब इस बात को लेकर काफी चिंतित दिखे क़ि समकालीन समय के ज़्यादातर फ़िल्मी अदाकार स्क्रिप्ट रोमन लिपि में पढ़ते हैं क्यूंकि वे देवनागरी लिपि में हिंदी नहीं पढ़ सकते. उनकी चिंता थी कि बोलचाल की हिंदी तो सिनेमा से प्रभावित होती रही है लेकिन वो हिंदी साहित्य और भाषा में कोई गंभीर योगदान कर पा रही है या नहीं यह बहस का विषय है. 


अक्टूबर २०१३ में मुझे उनसे अपने ब्लॉग के लिए एक साक्षात्कार लेने का मौका मिला। दरअसल उन दिनों एस्तोनिया के महाकाव्य 'कलेवपुत्र'के हिंदी अनुवाद के लिए उन्हें एस्तोनिया का the State Decoration of the Order of the Cross of Terra Mariana, IV Class से नवाजा गया था जिसके पुरस्कार समारोह में मैं भी शामिल हुआ.  यह साक्षात्कार आप ब्लॉग पर पूर्ण रूप  पढ़ सकते हैं।  सबसे जो चकित करने की बात उन्होंने कलेवपुत्र के लिए कही वह यह था की हम उसे भारतीय परिपेक्ष में दलित-आदिवासी-लोक परंपरा के तौर पर देख सकते हैं, न की महाभारत या रामायण सरीखे महाकाव्य के रूप में. उस ब्लॉग पर उनकी द्वारा अनुदित हिंदी महाकाव्य के कुछ पंक्ति भी उद्धृत थे जिन्हे मैं यहाँ आप सबों के समक्ष रखना चाहूंगा. 

मृत्यु की बेड़ियों में कलेवपुत्र ने संघर्ष किया
            यातना में अपना प्राण-त्याग किया.
            खेतों में रक्त जम गया
            घटनास्थल को लोहित रँगता हुआ.
            उसका शरीर पहले ही कड़ा और ठंढा हो चुका था,
            रक्तस्राव शांत हुआ,
            उसका ह्रदय निस्पंद.
            तब भी कलेवपुत्र की आँखें
            स्वर्ग के पिता के कक्षों की ओर
            स्पष्ट दमक रही थीं,
            ऊपर पुरातनपुरुष के आगारों की ओर.

                        अपने नश्वर बंधनों से मुक्त
            उसकी आत्मा उड़ी, एक दीप्तिमान पक्षी की भाँति
            वारिदों में विस्तीर्ण पंखों पर,
            वह स्वर्ग को आरोहित हुई.
            उसकी आत्मा की प्रच्छाया बनने के लिए स्वर्ग में
            एक स्वस्थ शरीर को निर्मित किया गया
            जो दैवी नायकों की क्रीड़ाओं पर,
            गर्जनकारों के भोजों पर,
            मधुरतर जीवन का स्वाद ग्रहण करता हुआ
            और अपने पार्थिव परिश्रम से विश्राम करता हुआ
            अपना हर्षनाद करता था.
            वह एक खुले अलाव के पास बैठा,
            तारा के नायकों के बीच,
            अपना सिर अपने हाथों पर टिकाए हुए,
            गायकों के कथाओं को सुनता हुआ;
            उसने अपने पार्थिव पराक्रमों को सुना
            जीवंत घटनाओं और अचंभों को
            अग्नि के पास वार्तालाप में –
            चारणों की स्वर्णजिव्ह चर्चा में.


बातें और स्मृतियाँ इतनी हैं कि शायद एक मोनोगराफ मैं कभी खरे साहब पर लिखूँ जिसमें उनकी कुछ कविताएँ जो मैंने अंग्रेज़ी में अनुदित कर रखी हैं वो भी शामिल कर पाऊँ। 

वो मेरी पुत्री सिया के प्रथम वर्षगाँठ पर २०१० में आए थे और परिवार के सभी सदस्यों से मिल पाए। अपनी बात मैं यहाँ मेरे पिता के निधन पर लिखे मेरे ब्लॉग पर आई उनकी लंबी टिप्पणी से ख़त्म करूँगा। दरअसल २०११ में अपने पिताजी के मृत्यु पर मैंने अंग्रेज़ी में एक लंबा लेख अपने ब्लॉग पर लिखा और उन्हें भी लिंक भेज दिया। उस लेख में Dylan Thomas और उनके उपर मेरे पिता के unfinished research work  की चर्चा मैंने की थी। दरअसल उस लेख में Dylan Thomas की कविता जो उन्होंने अपने पिता की मृत्यु पर लिखी थी उसपर भी चर्चा थी। वह कविता है: Do Not Go Gentle Into That Good Night.

उनकी अंग्रेज़ी में ही लिखी बड़ी लंबी टिप्पणी आई और उसमें उन्होंने Dylan Thomas, उनकी उस कविता पर  और फिर अपने पिता पर भी लिखा। शुरूआत में ही उन्होंने लिखा: Your father and I both are 1940-born...’

अपनी इस टिप्पणी में उन्होंने यह भी ज़िक्र किया कि इस कविता में ‘rage’ शब्द का कोई समकक्ष हिंदी शब्द ढूँढना प्रायः नामुमकिन सा रहा है क्योंकि ‘कुपित/नाराज़/ग़ुस्सा मत हो/न हो’ आदि सही नहीं लगते।’ 

अभी भी ब्लॉग पर वह लंबी टिप्पणी आप पढ सकते हैं।



--कुमार विक्रम