Friday, September 7, 2018

मौन शब्द




मौन शब्द

जीवन हम जीतना बाहर जीते हैं
उससे कई ज़्यादा
हम अपने अंदर बसते हैं
जहाँ अनकहे, अनगढ़ शब्दों का
अथाह मौन दरिया है
जिसमे डूबना है
खुद को खोकर
खुद को पाना है
शब्द कर जाते हैं दगा हमसे
हमारे मुख से चोरी छिपे निकल जाते हैं
जैसे हम बचपन की दुपहरिया में
भाग जाते थे खेलने
और माँ घर घर ढूंढ़ती फिरती थी हमें
मानो हम उसके सहेजे हुए शब्द हों
जिन्हे सोच समझ कर उसे बोलना है
और तभी शाम में तैयार कर
काजल, टिका, स्वेटर पहना कर ही
बाहर भेजा करती थी
शायद कुछ वैसे ही
जैसे गहरे मौन की दरिया में डूबकर
शब्द निकलते हैं हमारे
प्यारे मासूम बच्चों की तरह
आत्मीय, आश्वस्त, नम्र और उदार    

कुमार विक्रम
०७/०९/१८