Tuesday, August 21, 2018

सौम्या और आदित्य: पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक (भाग २)







सौम्या और आदित्य

(पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक-भाग २)

काजल सौम्या की बचपन की दोस्त है. दो जिस्म एक जान टाईप्स।  दोनों बचपन से ही साथ साथ बढे-पढ़े--पड़ोसी, स्कूल की सहपाठिन, अब कॉलेज में एक साथ, दोस्त, बहन, दुश्मन सबकुछ. काजल पिछले दो वर्षों से देख रही है कि सौम्या और आदित्य एक दूसरे से मिलते हैं ज़रूर लेकिन सौम्या ने आदित्य और अपने बीच में एक लकीर सी खींच रखी है. काजल को यह बात नहीं खटकती अगर सौम्या आदित्य के प्रति उदासीन होती और उनकी दोस्ती बस क्लास्मेट्स की तरह होती. लेकिन काजल को पता था कि सौम्या को भी आदित्य का इन्तेज़ार रहता था और आदित्य के कॉलेज छोड़ जाने के बाद सौम्या  का यह पक्ष थोड़ा खुल कर सामने आ रहा था.

आज काजल ने सौम्या को कैंटीन में सॉफ्ट ड्रिंक पीते हुए टोक ही दिया। 

काजल: तुमने आदित्य को इस तरह से टांग कर क्यों रखा हुआ है? 

सौम्या: टांग कर? ये क्या बात हुई?

काजल: हां, तो और क्या कहेंगे? इतने दिनों से तुम उससे मिल रही हो, पर क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने उसे यह जताने की कोशिश नहीं की हो कि तुम उससे मिलती हो क्यूंकि वो मिलना चाहता है, न कि तुम?

सौम्या: वेल, काफी हद तक तो यह सही भी है!

काजल: अगर ऐसा है तो तुम उससे मिलना छोड़ दो. कहो तो मैं ही कह देती हूँ उसे कि तुम अब सौम्या से मिलना बंद कर दो क्यूंकि वो तुमसे मिलना नहीं चाहती.

सौम्या (मुस्कुराते हुए): मुझे लग रहा है कि तुम्हारी उसपर नज़र है! 

काजल: बिलकुल नज़र है. उस पर नहीं. तुमपर। मुझे साफ़ दिख रहा है कि  तुम अपने आप से भाग रही हो. समय तेजी से बदलता है और हमें पता भी नहीं चलता है वो कब बदल जाता है. इससे पहले कि तुम आदित्य को खो बैठो, तुम कुछ सीरियस हो जाओ. 

(करीब दो मिनट की शांति, जिसमे कैंटीन का शोर शराबा काजल और सौम्या के बीच के संवाद को एक नयी दिशा देने में सहायक होता है) 

काजल: कास्ट? ईज़ दैट योर प्रॉब्लम? 

सौम्या: व्हाट कास्ट? इट डज़न्ट बोदर मी! 

काजल: सिर्फ तुम्हारे बोदर नहीं होने से क्या होगा? यू नो, व्हाट आई मीन. योर फैमिली एंड ऑल दैट. 

सौम्या: अरे, थोड़ा रुक जा! आज तो तू बिलकुल घोड़े पर ही बैठ गयी है. इतनी दूर सोच कौन रहा है? माय कंसर्न इज़ डिफरेंट। वो बिज़नेस करता है और मैंने आजतक अपने घर में किसी बिज़नेस वाले को देखा नहीं है. उनके बारे में हमलोगों के कुछ अपने पर्सेप्शन्स हैं. सही या गलत--ये तो पता नहीं।  लेकिन नौकरी करने वालों की उपब्रिंगिंग और बिज़नेस वालों में फर्क होता है.

काजल: यह सिर्फ देखने का एक नजरिया है. अब मेरा ही भैया बिज़नेस करने लगे है. हमारे भी घर में आजतक किसी ने बिज़नेस में हाथ नहीं लगाया. बट गॉड विल्लिंग, टुडे ही इज़ डूईंग वेल.

सौम्या: मैं शायद तुम्हे पूरी तरह से नहीं समझा पा रही हूँ. मेरे मन में कहीं न कहीं अपर्णा दी का केस घूमता रहता है. 

काजल: ओफ़ो! फिर वही बात! कोई ज़रूरी नहीं कि जो उनके साथ हुआ वो तुम्हारे साथ भी हो जाये. 

सौम्य: देखो कितना अच्छा चल रहा था उनका. अपने मन से अपर्णा दी ने संजीव भाई साहब से शादी की. कोई कास्ट-वास्ट का चक्कर भी नहीं था. अच्छा खासा उनका चाइनीज़ फर्नीचर का बिज़नेस था. फिर एक बार उनके पार्टनर ने धोखा दे दिया। और फिर तो जैसे सबकुछ ताश के पत्तों की तरह बिखर सा गया. अपर्णा दी के ससुराल से बिज़नेस के लिए पैसों की डिमांड आने लगी. फुआ और फूफाजी ने जहाँ तक हो सका किया। लेकिन एक अजीब तरह का टेंशन परिवारों में रहने लगा. सबसे तो आश्चर्य अपर्णा दी और संजीव भाई साहब के रिश्ते में आये बदलाव पर मुझे होता है. ऐसा लगता है जैसे वह रिश्ता भी चाइनीज़ ही था जिसने अपनी चमक यकायक खो दी. 

(अब तक दोनों कॉलेज की कैंटीन से निकल कर बस स्टॉप पर आ गए थे और घर जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहे थे) 

काजल: मुझे कभी कभी लगता है कि ज़्यादातर रिश्ते खोखले ही होते है, लेकिन चूंकि उनपर 'मेड इन इंडिया' का स्टाम्प होता है इसीलिए उनका पता नहीं चलता है. 

सौम्या: हूँ... शायद 

काजल: लेकिन जब तुम इतना कुछ सोचती रहती हो, तो फिर आदित्य से फ्रैंक बात ही कर लो

(इसी बीच उनकी बस आ जाती है और बस पकड़ने की जल्दी और उसके अंदर की भीड़-भड़क्का ने सौम्या को काजल के इस सवाल का उसी वक़्त जबाब देने से बचा लिया। वैसे भी सौम्या को अभी यह खुद को समझाना था कि कहीं आदित्य के बिज़नेस प्रोफ़ेशन के बारे में उसका डर उसके प्रति अपनी भावनाओं को ढकने का महज़ एक मुखौटा तो नहीं) 

-कुमार विक्रम 

  भाग १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ 

http://aboutreading.blogspot.com/2018/08/blog-post.html 

                                   


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