Monday, July 30, 2018

गुमशुदा समय की तलाश में






Courtesy: http://sisarias.com/

गुमशुदा समय की तलाश में 



एक महिला मुझे फ़ोन पर कहती है
मेरा पति महीनों से खोया हुआ है
मेरी बग़ल में बैठकर 
वह किसी दूसरी महिला से घंटों बातें करता रहता है
मैं कहता हूँ तुम उसे छोड़ दो
वह कहती है छूटा हुआ तो वह है ही

एक माँ शहर के अलग अलग थानों में 
अपने बेटे का नाम गुमशुदा हुए व्यक्तियों में 
दर्ज कराने की गुहार करती रहती है 
पुलिस वाले कहते हैं 
आपका बेटा आपके घर में ही है 
माँ कहती है वो मेरा बेटा नहीं है
मैं उसे बड़े अच्छे से पहचानती हूँ  

मुझे ख़याल आता है कि कैसे मैं 
सारा घर सर पर उठा लेता हूँ 
अपने खोए हुए ऐनक के लिए
और अचानक 
अपने शर्ट की पॉकेट में 
कुछ टटोलते हुए 
उसे पुनपा लेता हूँ 

यह सोचते हुए मैं ऐनक पहनकर 
उस पत्नी और उस माँ को
दिलासा देने के लिए अपने क़दम बढ़ाता हूँ 
और तभी गुमशुदा व्यक्तियों के ईश्तहार में 
उनके चेहरे देख ठिठक जाता हूँ 


कुमार विक्रम 

कविता का ऑडियो लिंक 
https://www.youtube.com/watch?v=nNyHSpYAM0k






Friday, July 20, 2018

हमारे समय का गीत: गीतकार नीरज की याद में








हमारे समय का गीत 

(गीतकार नीरज की याद में)

कहीं से कोई भद्दा सा लतीफ़ा 
मेरी शर्ट की पॉकेट में  गिरता है 
पॉकेट  को हड़बड़ा कर ख़ाली करने के क्रम में 
वह भद्दे तरह सी लटक जाती है
इससे पहले कि उसे मैं ठीक करूँ 
एक बदबूदार वीडियो क्लिप मेरे सर आ टकराता है 
उसके टुकड़े मेरे सामने नाचते लगते हैं  
कहीं कोई तीन युवक किसी महिला को 
उसके बाल खींच कर मार रहे हैं
कुछ युवक एक बूढ़े व्यक्ति को लतिया रहे हैं
हिलते डुलते तस्वीरों में कुछ चीखने की आवाज़ आती है 
जो गालियों और कर्कश अट्टास में दबी सी जाती हैं
उन टुकड़ों को मैं अपनी खिड़की से बाहर फ़ेंक देता हूँ 
लेकिन वो पेंडुलम का रूप ले लेती हैं 
और मेरे कमरे में नाचती हुई 
अंदर-बाहर होती रहती हैं 
मानो हमारे समय का 
अब बस यही गीत हमारे पास रह गया हो  

कुमार विक्रम