Sunday, December 16, 2018

Typo-A Poem




Typo-A Poem



A letter or a word
Gone off track 
May be the whole para
May be the whole document
I can accept them all
Life is short 
But not that short indeed

We can always correct
Withdraw, revisit
Words written or spoken
Consciously or out of habit 
If it helps.

But dear friend
How do you correct
The whole life
The whole civilisational discourse 
Based on 
Or synonymous with 
Typo

Kumar Vikram



Wednesday, October 3, 2018

Ándhere Band Kamre': Random Notes







ANDHERE BAND KAMRE: RANDOM NOTES

Ándhere Band Kamre' is surely one of my all time favourite books in Hindi. I consider it an artistically successful and psychologically sustaining story of the odd-even couple Harbans and Nilima. It was first published in 1961, and later translated by the immensely prolific translator, Jai Ratan, into English under the title ‘Lingering Shadows’. 57 years hence, I wonder how much Indian male has moved from being a Harbans, and how much genuinely liberated Indian female are, which Nilima wants to be in the novel.


One of the best things about the novel is long passages of narration in sort of stream-of-consciousness mode which read like poetry. Surely we have read many in English modernist phase, but read in Indian context and in Hindi, they really make powerful impact.

Mohan Rakesh(1925-1972)
These poetic passages are sort of better than what we find in Nirmal Verma because in Verma poetic idiom becomes more overriding than its intention, whereas in this novel of Mohan Rakesh, they seem to stem more from the psychological treatment of the characters and the novelist seems to have better control over them.

--Kumar Vikram

(this is a developing story...)

Friday, September 7, 2018

मौन शब्द




मौन शब्द

जीवन हम जीतना बाहर जीते हैं
उससे कई ज़्यादा
हम अपने अंदर बसते हैं
जहाँ अनकहे, अनगढ़ शब्दों का
अथाह मौन दरिया है
जिसमे डूबना है
खुद को खोकर
खुद को पाना है
शब्द कर जाते हैं दगा हमसे
हमारे मुख से चोरी छिपे निकल जाते हैं
जैसे हम बचपन की दुपहरिया में
भाग जाते थे खेलने
और माँ घर घर ढूंढ़ती फिरती थी हमें
मानो हम उसके सहेजे हुए शब्द हों
जिन्हे सोच समझ कर उसे बोलना है
और तभी शाम में तैयार कर
काजल, टिका, स्वेटर पहना कर ही
बाहर भेजा करती थी
शायद कुछ वैसे ही
जैसे गहरे मौन की दरिया में डूबकर
शब्द निकलते हैं हमारे
प्यारे मासूम बच्चों की तरह
आत्मीय, आश्वस्त, नम्र और उदार    

कुमार विक्रम
०७/०९/१८

Tuesday, August 21, 2018

सौम्या और आदित्य: पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक (भाग २)







सौम्या और आदित्य

(पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक-भाग २)

काजल सौम्या की बचपन की दोस्त है. दो जिस्म एक जान टाईप्स।  दोनों बचपन से ही साथ साथ बढे-पढ़े--पड़ोसी, स्कूल की सहपाठिन, अब कॉलेज में एक साथ, दोस्त, बहन, दुश्मन सबकुछ. काजल पिछले दो वर्षों से देख रही है कि सौम्या और आदित्य एक दूसरे से मिलते हैं ज़रूर लेकिन सौम्या ने आदित्य और अपने बीच में एक लकीर सी खींच रखी है. काजल को यह बात नहीं खटकती अगर सौम्या आदित्य के प्रति उदासीन होती और उनकी दोस्ती बस क्लास्मेट्स की तरह होती. लेकिन काजल को पता था कि सौम्या को भी आदित्य का इन्तेज़ार रहता था और आदित्य के कॉलेज छोड़ जाने के बाद सौम्या  का यह पक्ष थोड़ा खुल कर सामने आ रहा था.

आज काजल ने सौम्या को कैंटीन में सॉफ्ट ड्रिंक पीते हुए टोक ही दिया। 

काजल: तुमने आदित्य को इस तरह से टांग कर क्यों रखा हुआ है? 

सौम्या: टांग कर? ये क्या बात हुई?

काजल: हां, तो और क्या कहेंगे? इतने दिनों से तुम उससे मिल रही हो, पर क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने उसे यह जताने की कोशिश नहीं की हो कि तुम उससे मिलती हो क्यूंकि वो मिलना चाहता है, न कि तुम?

सौम्या: वेल, काफी हद तक तो यह सही भी है!

काजल: अगर ऐसा है तो तुम उससे मिलना छोड़ दो. कहो तो मैं ही कह देती हूँ उसे कि तुम अब सौम्या से मिलना बंद कर दो क्यूंकि वो तुमसे मिलना नहीं चाहती.

सौम्या (मुस्कुराते हुए): मुझे लग रहा है कि तुम्हारी उसपर नज़र है! 

काजल: बिलकुल नज़र है. उस पर नहीं. तुमपर। मुझे साफ़ दिख रहा है कि  तुम अपने आप से भाग रही हो. समय तेजी से बदलता है और हमें पता भी नहीं चलता है वो कब बदल जाता है. इससे पहले कि तुम आदित्य को खो बैठो, तुम कुछ सीरियस हो जाओ. 

(करीब दो मिनट की शांति, जिसमे कैंटीन का शोर शराबा काजल और सौम्या के बीच के संवाद को एक नयी दिशा देने में सहायक होता है) 

काजल: कास्ट? ईज़ दैट योर प्रॉब्लम? 

सौम्या: व्हाट कास्ट? इट डज़न्ट बोदर मी! 

काजल: सिर्फ तुम्हारे बोदर नहीं होने से क्या होगा? यू नो, व्हाट आई मीन. योर फैमिली एंड ऑल दैट. 

सौम्या: अरे, थोड़ा रुक जा! आज तो तू बिलकुल घोड़े पर ही बैठ गयी है. इतनी दूर सोच कौन रहा है? माय कंसर्न इज़ डिफरेंट। वो बिज़नेस करता है और मैंने आजतक अपने घर में किसी बिज़नेस वाले को देखा नहीं है. उनके बारे में हमलोगों के कुछ अपने पर्सेप्शन्स हैं. सही या गलत--ये तो पता नहीं।  लेकिन नौकरी करने वालों की उपब्रिंगिंग और बिज़नेस वालों में फर्क होता है.

काजल: यह सिर्फ देखने का एक नजरिया है. अब मेरा ही भैया बिज़नेस करने लगे है. हमारे भी घर में आजतक किसी ने बिज़नेस में हाथ नहीं लगाया. बट गॉड विल्लिंग, टुडे ही इज़ डूईंग वेल.

सौम्या: मैं शायद तुम्हे पूरी तरह से नहीं समझा पा रही हूँ. मेरे मन में कहीं न कहीं अपर्णा दी का केस घूमता रहता है. 

काजल: ओफ़ो! फिर वही बात! कोई ज़रूरी नहीं कि जो उनके साथ हुआ वो तुम्हारे साथ भी हो जाये. 

सौम्य: देखो कितना अच्छा चल रहा था उनका. अपने मन से अपर्णा दी ने संजीव भाई साहब से शादी की. कोई कास्ट-वास्ट का चक्कर भी नहीं था. अच्छा खासा उनका चाइनीज़ फर्नीचर का बिज़नेस था. फिर एक बार उनके पार्टनर ने धोखा दे दिया। और फिर तो जैसे सबकुछ ताश के पत्तों की तरह बिखर सा गया. अपर्णा दी के ससुराल से बिज़नेस के लिए पैसों की डिमांड आने लगी. फुआ और फूफाजी ने जहाँ तक हो सका किया। लेकिन एक अजीब तरह का टेंशन परिवारों में रहने लगा. सबसे तो आश्चर्य अपर्णा दी और संजीव भाई साहब के रिश्ते में आये बदलाव पर मुझे होता है. ऐसा लगता है जैसे वह रिश्ता भी चाइनीज़ ही था जिसने अपनी चमक यकायक खो दी. 

(अब तक दोनों कॉलेज की कैंटीन से निकल कर बस स्टॉप पर आ गए थे और घर जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहे थे) 

काजल: मुझे कभी कभी लगता है कि ज़्यादातर रिश्ते खोखले ही होते है, लेकिन चूंकि उनपर 'मेड इन इंडिया' का स्टाम्प होता है इसीलिए उनका पता नहीं चलता है. 

सौम्या: हूँ... शायद 

काजल: लेकिन जब तुम इतना कुछ सोचती रहती हो, तो फिर आदित्य से फ्रैंक बात ही कर लो

(इसी बीच उनकी बस आ जाती है और बस पकड़ने की जल्दी और उसके अंदर की भीड़-भड़क्का ने सौम्या को काजल के इस सवाल का उसी वक़्त जबाब देने से बचा लिया। वैसे भी सौम्या को अभी यह खुद को समझाना था कि कहीं आदित्य के बिज़नेस प्रोफ़ेशन के बारे में उसका डर उसके प्रति अपनी भावनाओं को ढकने का महज़ एक मुखौटा तो नहीं) 

-कुमार विक्रम 

  भाग १ पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ 

http://aboutreading.blogspot.com/2018/08/blog-post.html 

                                   


Wednesday, August 1, 2018

सौम्या और आदित्य: पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक--१






सौम्या और आदित्य (पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक--१ )


आदित्य बी कॉम करके  अपने पारिवारिक बिज़नेस में लगा हुआ है और सौम्या दर्शनशास्त्र में एम.ए कर रही है। दोनों एक दूसरे को पिछले दो बरसों से जानते हैं क्योंकि एक ही कॉलेज में पढ़ते आए हैं। सौम्या को आदित्य पसंद है लेकिन अभी उनकी दोस्ती टेस्टिंग फ़ेज़ में है।बात बात में आदित्य को झिड़क देना आदित्य को समझने का सौम्या का अपना तरीक़ा है। आदित्य यह समझने लगा है और उसकी हर झिड़क को गहराते हुए दोस्ती के रूप में लेता है।

और एक दिन जब आदित्य सौम्या से मिलने विश्वविद्यालय पहु्ंता है तो...
—-
सौम्या: हाउ डेयर यू? तुम कल मेरे घर तक कैसे पहुँच गए?

आदित्य: नहीं, मुझे तो पता भी नहीं कि वो तुम्हारा घर था. मैं अपने पापा के एक क्लाइंट का पता पूछने गया था?

सौम्या: और पता पूछने के लिए तुम्हे मेरे घर के अलावा और कोई घर नहीं दिखा! व्हाट डू यू थिंक आई वाज़ बॉर्न येस्टेरडे? 

आदित्य: तुम्हे ज़्यादा भाव खाने की ज़रुरत नहीं है. पता नहीं अपने आप को क्या समझती हो? 

सौम्या: एरिस्टोटल का नाम भी सुने हो?

आदित्य: एरिस्टोटल? मुझे सिर्फ हिसाब किताब का टोटल करने आता है और उसमें मैं बहुत माहिर हूँ।

सौम्या: लग ही रहा है! प्लेटो का नाम सुना है? 

आदित्य: नहीं, हमारा प्लेट का बिज़नेस नहीं है. मेरा मेडिकल इक्विपमेंट्स का बिज़नेस है और हम टूटे हुए दिलों को जोड़ते हैं. 

——
सौम्या ग़ुस्से में मुँह बनाकर चली जाती है हालाँकि आदित्य से अपने आँखों की हँसी को नहीं छुपा पाती है!

—कुमार विक्रम 

Monday, July 30, 2018

गुमशुदा समय की तलाश में






Courtesy: http://sisarias.com/

गुमशुदा समय की तलाश में 



एक महिला मुझे फ़ोन पर कहती है
मेरा पति महीनों से खोया हुआ है
मेरी बग़ल में बैठकर 
वह किसी दूसरी महिला से घंटों बातें करता रहता है
मैं कहता हूँ तुम उसे छोड़ दो
वह कहती है छूटा हुआ तो वह है ही

एक माँ शहर के अलग अलग थानों में 
अपने बेटे का नाम गुमशुदा हुए व्यक्तियों में 
दर्ज कराने की गुहार करती रहती है 
पुलिस वाले कहते हैं 
आपका बेटा आपके घर में ही है 
माँ कहती है वो मेरा बेटा नहीं है
मैं उसे बड़े अच्छे से पहचानती हूँ  

मुझे ख़याल आता है कि कैसे मैं 
सारा घर सर पर उठा लेता हूँ 
अपने खोए हुए ऐनक के लिए
और अचानक 
अपने शर्ट की पॉकेट में 
कुछ टटोलते हुए 
उसे पुनपा लेता हूँ 

यह सोचते हुए मैं ऐनक पहनकर 
उस पत्नी और उस माँ को
दिलासा देने के लिए अपने क़दम बढ़ाता हूँ 
और तभी गुमशुदा व्यक्तियों के ईश्तहार में 
उनके चेहरे देख ठिठक जाता हूँ 


कुमार विक्रम 

कविता का ऑडियो लिंक 
https://www.youtube.com/watch?v=nNyHSpYAM0k






Friday, July 20, 2018

हमारे समय का गीत: गीतकार नीरज की याद में








हमारे समय का गीत 

(गीतकार नीरज की याद में)

कहीं से कोई भद्दा सा लतीफ़ा 
मेरी शर्ट की पॉकेट में  गिरता है 
पॉकेट  को हड़बड़ा कर ख़ाली करने के क्रम में 
वह भद्दे तरह सी लटक जाती है
इससे पहले कि उसे मैं ठीक करूँ 
एक बदबूदार वीडियो क्लिप मेरे सर आ टकराता है 
उसके टुकड़े मेरे सामने नाचते लगते हैं  
कहीं कोई तीन युवक किसी महिला को 
उसके बाल खींच कर मार रहे हैं
कुछ युवक एक बूढ़े व्यक्ति को लतिया रहे हैं
हिलते डुलते तस्वीरों में कुछ चीखने की आवाज़ आती है 
जो गालियों और कर्कश अट्टास में दबी सी जाती हैं
उन टुकड़ों को मैं अपनी खिड़की से बाहर फ़ेंक देता हूँ 
लेकिन वो पेंडुलम का रूप ले लेती हैं 
और मेरे कमरे में नाचती हुई 
अंदर-बाहर होती रहती हैं 
मानो हमारे समय का 
अब बस यही गीत हमारे पास रह गया हो  

कुमार विक्रम 
  



Monday, January 22, 2018

भूले बिसरे औपचारिक शब्द






भूले बिसरे औपचारिक शब्द 

पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी 
बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे 
मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर 
अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों 
जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों 
स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में 
हम उनसे अकसर टकराते रहते थे

'युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं
टकराव का हल बातचीत से निकलना चाहिए'
'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता'
'परिस्थितियां कैसी भी हो किसी भी नागरिक को 
क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है'
मेरे उनसे वैचारिक मतभेद ज़रूर थे
पर उनकी मृत्यु मेरे अंदर एक ख़ालीपन छोड़ गई है'
'पड़ोसी देशों के साथ हमारे राजनैतिक मतभेद भले ही हों
हमें अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को नहीं भूलना चाहिए'
'कर्म करो फल की चिंता  करोआदि 

पर अब जब सारे मुखौटे टूट कर गिर गए हैं
हम इन रटे रटाए शब्दों को सुनने को तरस गए हैं 
मानो मन में एक कसक सी रहती है 
कि पुराने जमाने के कुछ जुमले 
भ्रम स्वरूप ही जीवन में बचे रहने चाहिए
ताकि मनुष्य की बची हुई मनुष्यता के बचने की
संभावना थोड़ी बची रहे 
शायद कुछ वैसे ही 
जैसे टूटते खंडहरों को समाज बचाकर रखता है
जहाँ स्कूली बच्चे पिकनिक के लिए ले जाए जाते हैं
और रटे रटाए ऐतिहासिक जुमलों के सहारे 
गाइड उन्हें इतिहास बोध करवाता है

कुमार विक्रम