Friday, August 25, 2017

निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल




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निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल



हर साल बाढ़ से बेघर हुए
लाखों लोग
राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे 
हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट
को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त
बच्चे जवान और बूढ़े
ज़िला अस्पताल के गलियारों में
अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते
मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक
भावी इतिहास हमारा है
जैसे नारों से दूर बहुत दूर
अनिश्चित वर्तमान में डूबे हुए
पूरी तरह सार्वजनिक है उनकी निजता
और उनका स्वाभिमान दुख व दर्द
उनके लिए निजता पर
महान अदालत का महान निर्णय
कुछ नहीं बस
एक मध्यवर्गीय परिकल्पना है
खाए-अघाए प्राणियों की आख़िरी कल्पना है
जिसपर अपने घर के दरवाज़े बंद कर
महफ़ूज़ होकर सोने वाले
खुलकर सार्वजनिक बहस करते हैं


कुमार विक्रम

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