Friday, August 4, 2017

बीध: एक छोटी-सी लम्बी कविता





बीध

पारिवारिक अनुष्ठानों में
कर्मकाण्डो में
घर की सबसे अनपढ़ महिला द्वारा
बताये जाने वाला
ऐसा ज्ञान जिसे हम सब ने छोड़करभूलकर
अपना रखा है याद कर रखा है
मानो एक परिपूर्ण जीवन
अपने पूरे विधि विधान को खोकर
एक गँभीर बीध की तरह
हमारे साथ रहने का कोई नाटक करता हो
जिसे निभाना अपने आप में
कोई विचार प्रणाली से कमतर नहीं
जैसे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ते बच्चे
हिंदी या उर्दू के कुछ लफ्ज़ अनमने भाव से सीखते हों
इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ
कि एक पूरी की पूरी संस्कृति
साहित्य एवं विचारों की पदत्ति
इन अक्षरों शब्दों वणॅमालाओं आदि से जुङी हुई है
और अब उनके सामने एक बीध के रूप में खड़ी हुई है
जिन्हें मैं एक अनपढ़ महिला की तरह
पूरी गँभीरता से उन्हें सीखाता हूँ

स्मरण करता हूँ संस्कृत के वो कुछ शब्दश्लोकमंत्र
मैथिली भोजपुरी मगही वज्जिका अंगिका
और उससे भी कुछ दीगर 'घरेलूबोलियों में
गाये जाने वाले ब्याह या विरह के गीत
जिन्हें हम अपनी खड़ी बोली हिंदी में
खिसियानी हंसीं को छिपाकर
फिरंगी सा दुहराते रहे 
लेकिन जिनका 
परिपूर्ण जीवंत एवं प्राकृतिक वातावरण हमसे अछूता रहा
और सिर्फ हंसीं ठिठोली शोक उल्लाह्स
जैसे गहन भावों में हमारे संग रहा
शायद उसी तरह से जैसे जीवन में कभी कभार
ईमानदारी के कुछ कर्म
हम ज़रूरी समझ करते हैं
कुछ सत्य वचन रिकॉर्ड के लिए बोलते हैं

बीधों में सबकुछ आत्मसात कर लेने का
एक अजीब दर्शन है
और जो सबसे ज्यादा निरक्षर ठहरा
वही इन बीधों का सबसे बड़ा ज्ञाता बना
पेड़ पौधे पत्थर जल पत्ते मछली मृत जीवित मरणासन्न
हल्दी नमक चीनी घी बताशे तेल आकाश पताल ज़मीन
और उनसे भी आगे की दुनिया के सारे तत्त्व
किसी  किसी रूप में
अपना अस्तित्व इनमें रखते हैं
कुछ इस तरह से
कि अन्धकार और रौशनी के बीच कोई अंतर ही ना रहे
तभी तो वो दुल्हन
जिसे दहेज़ के लिए जला डाला जाएगा
उसे भी मुंह दिखाई मिलती है
और वह नेता
जो कई आपराधिक-भ्रष्ट मामलों में शरीक है
उसे भी देश का तिरंगा फहराने की स्वतंत्रता है
और बच्चे पूरी तन्मयता से उसके सामने
'
जन-गण-मनगाते हैं
शहीद भगत सिंह बनते हैं
'
जय हिन्दके नारे बुलंद करते हैं
सरकारी अफसरपुलिसकर्मी आदि उसके लिए
अफरा तफरी में रास्ते खाली कराते हैं
खुद बीधों में तब्दील होते हैं

बीधें अपने आप में शायद कुछ नहीं
लेकिन उनके बगैर मानो सबकुछ व्यर्थ हो
एक ऐसा गंभीर कर्त्तव्य जिसे निभाना
पृथ्वी ग्रह को किसी अलौकिक शक्ति के प्रकोप से
बचा लेने से कम नहीं
इसीलिए रविवारों को
दोस्तों रिश्तेदारों को फ़ोन कर
किसी अगले रविवार पर आमंत्रित करने की जिम्मेवारी
हम निभाते रहते हैं
फ़ोन  करने के उलाहने देते हैं
अगली बार सपरिवार आने की ज़िद करते हैं
लगातार ऐसे स्वांग रचते रहते हैं
और इसीलिए शायद बीधों की खिलाफत करने वाले
खिलाफत की नयी बीधें बनाते हैं
जिसे अपनाना भी अंततः
एक रूपात्मक जीवन का कामुक आलिंगन
ही कर रह जाना है 

कुमार विक्रम