Thursday, October 20, 2016

"पुस्तक-दहन": बर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता




Bertolt Brecht



बर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता
पुस्तक-दहन

जब निजाम ने
नाज़ायज़ पुस्तकों को जलाने का हुक्म दिया
तब कुंठित बैलों के कई गिरोह गाड़ियों में भर भर कर
घसीटते हुए किताबें होलिका दहन के लिए लेकर आये
बहिष्कृत पुस्तकों की सूची पर निगाह डालते हुए
एक अति-प्रतिष्ठित निर्वासित लेखक ने
अपनी नाराज़गी व्यक्त की क्योंकि उसका नाम उसमे नहीं था
घृणित क्रोध में बिदबिदाता हुआ वह अपनी मेज़ की तरफ़ लपका और
उन कम-अक्ल शाषकों के लिए पत्र लिखने लगा
मुझे जला डालो ! अपने धधकते हुए कलम से उसने लिखा-
क्या मैंने हमेशा सिर्फ सच नहीं लिखा?
और अब तुम मुझे झूठा साबित करने पर लगे हो!
जला डालो मुझे !
अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित
हिन्दी अनुवाद: कुमार विक्रम
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The Burning of the Booksby Bertolt Brecht
translated by Michael R. Burch
When the Regime
commanded the unlawful books to be burned,
teams of dull oxen hauled huge cartloads to the bonfires.
Then a banished writer, one of the best,
scanning the list of excommunicated texts,
became enraged: he’d been excluded!
He rushed to his desk, full of contemptuous wrath,
to write fierce letters to the morons in power —
Burn me! he wrote with his blazing pen —
Haven’t I always reported the truth?
Now here you are, treating me like a liar!
Burn me!