Monday, August 29, 2016

Ignorance is not what we do not know



Ignorance is not what we do not know 


Ignorance is not what we do not know
Or remain oblivious of
Indifferent to knowledge unknown to us;
It is there very much in the light that guides us
Bred by knowledge that we proudly boast of
As they say, right there, in between the lines
It resides, like a beloved all set to dump you
While sleeping in your embrace.


Kumar Vikram

Tuesday, August 23, 2016

रियो से आशाएं






रियो से आशाएं 


प्रतियोगिताओं में 
दूसरे नंबर, तीसरे नंबर, 
चौथे नंबर, बीसवें नंबर 
पैंतीसवें नंबर पर आकर 
चोट खाकर मैदान से बाहर होकर 
देश दुनिया परिवार अथवा खुद का 
नाम नहीं रोशन कर भी
जीवन जीया सकता है 
अपने तुम्हे अभी भी गले लगा सकते हैं 
गर्व से तुम्हे अपना कह सकते हैं 
प्रथम आना अभी भी एकमात्र प्राथमिकता नहीं 
ऐसा तुम भी महसूस कर सकते हो
शायद सबकुछ अभी ख़त्म नहीं हुआ है 
शायद अभी भी तुम 
गुमनाम गलियों से बाहर निकाले जा सकते हो 
या फिर निडर होकर 
गुमनामी में धकेले जाने का सोच सकते हो    

कुमार विक्रम 
 

Friday, August 12, 2016

इस प्रतिक्रियावादी समय में



इस प्रतिक्रियावादी समय में 

कब हम सब उनकी ही तरह बोलने लगते है 
इसका इल्म हो पाना भी लगभग मुश्किल है 
ईंट का जबाब पत्थर से देने का सुरूर 
आँख के बदले आँख की भावना
झूठ और सच के फाँक के बीच फंसकर रह जाना 
बातों की पूँछ पकड़ कर गंगा पार कर जाना
कोरस का हिस्सा बनकर जीना  
दरअसल धीरे धीरे काले बादल की तरह 
हम सबको वो आगोश में लेने लगते हैं 
कुछ वैसे ही जैसे 
कोई मादक वस्तु उसका सेवन करने वालों के बीच 
कोई फर्क नहीं करती है 
और सबके सर चढ़ कर एक ही बोली बोलने लगती है

 कुमार विक्रम    

Wednesday, August 10, 2016

इरोम शर्मिला के नाम एक भारतीय ओलिंपियन का पत्र





इरोम शर्मिला के नाम एक भारतीय ओलिंपियन का पत्र


इरोम शर्मिला!
बहुत जल्द तुमसे भी मांगेंगे वो हिसाब
तुम्हारे १६ वर्षों के
तप-उपवास-संघर्ष-पीड़ा-समर्पण-यातना का प्रतिफल
क्या तुम्हे ओलिंपिक में स्वर्ण मिला?
क्या आफ्स्पा हटा?
क्या दमन घटा?
क्या किसी नए सूरज, नयी रौशनी के साथ
कोई नया पौ फटा?
या फिर तुम भी हमारी ही तरह
देश दुनिया के अखबारों में, टीवी चैनलों में
अपने फोटो छपवाने में ही व्यस्त रही
जबकि देश के करदाता
हर पल हर दिन तुम्हारी सफलता के लिए
प्रयत्नरत रहे, लगभग, त्रस्त रहे?

इरोम शर्मिला!
हो सकता है
तुम्हे भी मेरी ही तरह
कुछ बहाने बनाने पड़े
कैसे जहाँ जल्द से जल्द
रातो-रात सारे ऐशो-आराम पा लेने का जुनून हो
कर देकर ही अपने सारे दायित्त्वों से
मुक्त हो जाने का क़ानून हो
वहां मैंने लक्ष्य रखा
सबसे लंबे रास्ते पर चलने का
जैसे तुमने अपने शरीर को स्थिर कर
मन को अडिग रखा
और लाइकोट पहाड़ियों का लघुरूप बन गयी
शायद शरीर को कुछ और गति प्रदान कर
मेरे अंदर भी अनवरत बरसों से 
कुछ वैसी ही अडिगता रही
शायद दोनों ही लाँघना चाहते थे सीमायें
शरीर की और मन की संकीर्णताओं की

इरोम शर्मिला!
किसे दिलचस्पी है
मानवीय संघर्षों की बारीकियों में
खून और पसीने की बदबुओं में
तिल-तिल कर गुमनाम गलियों में
अपने आँखों की चमक को
सहेज कर रखने वालों के ज़द्दोज़हद में
एक थोड़ी सी अच्छी
थोड़े से गैर-मामूली सपनो के सफल करने के
अनगिनत असफल प्रयासों में
खेल के मैदान से हो कर गुजरने वाले
खूससूरत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में
हम तो दरअसल उन तमाशों की तरह हैं
जिसके अंत में मनुष्य मरे या सांड 
दोनों ही स्थितियों में मनोरंजन भरपूर होता है.

कुमार विक्रम     

 (9 अगस्त २०१६ को मणिपुर की मानवाधिकार नेता इरोम शर्मिला ने आफ्स्पा के खिलाफ अपने १६ वर्षो से अनवरत चले आ रहे अनशन को तोड़ने का निर्णय लिया और उसी दिन एक सोशलाइट लेखिका ने भारत के रियो ओलंपिक्स में निराशाजनक प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को दोषी ठहराते हुए उनपर सिर्फ मौज-मस्ती के लिए इन स्पर्धाओं में भाग लेने का आरोप लगाया.)    

Monday, August 8, 2016

ताक़तवर व्यक्तियों की विशेषताएं





ताक़तवर व्यक्तियों की विशेषताएं 

अगर आप समझते हैं कि आपके आदर्शवादी और ईमानदार और मेहनती शख्शियत से ताक़तवर व्यक्ति डर जाएगा या प्रभावित हो जाएगा या कहीं उसके मन के कोने में आपके प्रति कोई अच्छी भावना जग जायेगी तो फिर आपसे बड़ा भोला-भाला कोई और नहीं माना जाएगा क्यूंकि आपके सामने वह आपसे भी अधिक आदर्शवादी, ईमानदार और मेहनतकश बन कर आएगा वेद-पुराण या किन्ही महापुरुषों के सद्वचनों को उद्धरित करते हुए अपने जीवन में खुद कई बार मेहनत का फल मीठा होता है या ईमानदारी सबसे अच्छी नीति होती है आदि कई अनुभवों के बारे में बड़ी शालीनता से आपको समझाते हुए वह नज़र आएगा हालाँकि आप शायद उसे यह समझाने में असफल हीं रहेंगे कि कैसे आपने ईमानदारी और आदर्शों की धज़ज़ियाँ उड़ते देखी हैं और फिर भी आप न जाने क्यों उनमें विश्वास रख कर बैठे हैं जबकि वह ताक़तवर व्यक्ति आपसे मिलने के बाद किसी नीच, मक्कार, चापलूस किस्म के व्यक्ति से मिलते वक़्त उसे नीचता, मक्कारी और चापलूसी के नए गूढ़ सिखाता पाया जाएगा. 

कुमार विक्रम 

Monday, August 1, 2016

सर्वदलीय बैठक



सर्वदलीय बैठक



माहौल दरअसल बिलकुल वैसा ही था
जैसा किसी महान व्यक्ति की मृत्यु पर आयोजित
सर्वधर्म शोक-सभा का होता है
अपने-अपने धर्म की सुपरिचित पोशाकों में
सिर्फ अपने धर्म के श्लोकों
अथवा आयतों का पाठ करते हुए
कुछ इस भावना के साथ
कि सभी धर्म मूलतः एक से हैं
उस परमात्मा तक पहुचने तक
बस अलग अलग पथ हैं
ठीक उसी तरह जैसे देश का विकास
सबों का एक मात्र उद्देश्य है
वहीं बैठक के बाहर हर दल के भक्त
धर्मों के बीच की असमानताओं को
बढ़ चढ़ कर बांच रहे थे
जो अंदर बैठे दलों के प्रतिनिधियों ने ही
उन्हें कक्षा कार्य के रूप में दिए थे

कुमार विक्रम