Wednesday, March 9, 2016

"उद्भावना" में प्रकाशित मेरी एक कविता 'नदियां

नदियां


कहते हैं सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती हैं 
लेकिन मुझे तलाश है एक नदी की
जो सभ्यताओं के सहारे टिकी हो
मेरा नदियों से ख़ास कोई रिश्ता नहीं रहा है
न तैराक बन पाया, न ही प्रकृति प्रेमी
किताबों से, आस-पास से एकत्रित जानकारियों से
यह समझता हूँ कि मेरी प्यास बुझाने को
कहीं न कहीं किसी न किसी नदी का जल ही
मुझतक चलकर पहुँचता है
और यह इल्म कि नदियों की मेहनत को
बस यूँ ही गौण मानकर चलना
न जाने कितनी सभ्यताओं के
प्यास से छटपटा कर
ग़ुम हो जाने का कारण बनता रहा है
मुझे सालता रहता है
क्यूंकि नदियां पहाड़ नहीं हैं
जो बस अपनी जगह टिके रहते हैं
अपनी ऊंचाई से ही अभिभूत
जिनसे मिलने और संवाद के लिए
उनके घर चलकर जाना होता है
जबकि नदियां
पहाड़ो के सामाजिक दायित्वों को निभाने
दर-दर, शहर-शहर, गाँव- गाँव
पहुँचती रहती हैं
नदियां सूरज भी नहीं
अपने तेज और दूरी से ही
खुद में यूँ खोया हुआ
मानो रौशनी बिखेरना
कोई दफ्तरी धर्म हो
जिसे बिना किसी राग और द्वेष के
समान भाव से पूर्ण करने का स्वांग
करना होता है
जबकि अन्धकार का साम्राज्य
दिन-प्रति-दिन, रात-प्रति-रात
उसके नाकों तले सशक्त होता रहता है
नदियां हवा भी नहीं हैं
निराकार, निर्विकार और
स्पर्श की अनुभूति से ही
अपनी सरूपता दर्शाती हुई
जिसके बगैर
जीवन की कल्पना असंभव तो है
मगर जिससे कोई
उतना ही निरपेक्ष रहता है
जितना कोई अपने अनुवांशिक तत्व से होता है
और जिसकी अनुपस्थिति का अनुभव
संग्रह करना सर्वथा असंभव होता है
शायद सभी प्राकृतिक उपहारों में
नदियों को ही सबसे मानुषिक,
अतः सबसे दुरूह कार्य सौंपा गया है
जिन्हें अर्धनिर्मित मानवों के
गुणों और अवगुणों से निबटना होता है
उनके नैसर्गिक प्यास के साथ-साथ
उनके छल-कपट, विष, मल
आदि भी ढोना होता है
और इस तरह नदियों को बनना होता है
मध्य की एक कड़ी
अर्ध-मानव, अर्ध-प्राकृतिक
कुछ-कुछ उन स्त्रियों की तरह
जिनके नाम उन्हें दिए गए हैं
जिनके लिए माँ, मैया जैसे सम्बोधनों को
गढ़ना बड़ा आसान है
पर जिनके एक तरफा मातृक स्नेह
के बोझ को समझने के लिए
जल के उन बूँद बूँद में भीगना है
जिनसे हमारे शरीर की,
पाँव तले ज़मीन की
बुनावट है.

कुमार विक्रम

No comments:

Post a Comment

LITERATURE AND PSYCHOLOGY: DISCUSSING OEDIPUS COMPLEX, HAMLET, LADY MACBETH, WUTHERING HEIGHTS ET Al by KUMAR VIKRAM

Link to the Video Talk Literature And Psychology A Talk by Kumar Vikram (You are requested to Copy and Paste the below URL in your address b...