Wednesday, October 26, 2016

नीरो की याद में




नीरो की याद में 


शासक संगीत प्रेमी था 
प्रेमी क्या संगीतज्ञ ही था 
उसकी पूरी दिनचर्या ही संगीतमय थी 
अलस्सुबह राग भैरव से दिन का शुभारम्भ 
फिर गोल गोल मद्धिम नाचती पृथ्वी के संग संग 
शहनाई वादकों, तबलचियों के साथ 
दिन भर गायकी का दौर 
जो राग मालकौंस से ही समाप्त होता 
शाषक को यह टीस रहती थी 
कि प्रजा संगीत से दूर होती जा रही है 
उन्हें रागों की कोई समझ नहीं
वाद्य -वृंदों के प्रति वो नितांत निरपेक्ष थे 
और संगीतज्ञों और घरानों के प्रति उदासीन 
फलतः वह प्रसिद्द संगीतकारों के आदमकद पुतलों 
संगीत संग्रहालयों के महत्वाकांक्षी योजनाओं
आकर्षक नृत्यशालाओं
पाठ्यक्रमों में संगीत संबंधी सामग्रियों 
को तीक्ष्णता से बनवाने को मजबूर हुआ
और इन मधुर शासकीय परियोजनाओं में
खलल डालने वाले
हर स्वर गैर-संगीतीय घोषित किये गए
जैसे
पक्षियों का चहचहाना
प्रेमी-प्रेमिका का आलिंगन
चाँद की रौशनी में कोई भूला-बिसरा गीत गुनगुनाना
बारिश में पोर-पोर भींग जाना
बच्चों का परियों की देश में जाना
संगीतकारों का दरबारों और रंगशालाओं से बाहर निकलना।

कुमार विक्रम

Thursday, October 20, 2016

"पुस्तक-दहन": बर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता




Bertolt Brecht



बर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता
पुस्तक-दहन

जब निजाम ने
नाज़ायज़ पुस्तकों को जलाने का हुक्म दिया
तब कुंठित बैलों के कई गिरोह गाड़ियों में भर भर कर
घसीटते हुए किताबें होलिका दहन के लिए लेकर आये
बहिष्कृत पुस्तकों की सूची पर निगाह डालते हुए
एक अति-प्रतिष्ठित निर्वासित लेखक ने
अपनी नाराज़गी व्यक्त की क्योंकि उसका नाम उसमे नहीं था
घृणित क्रोध में बिदबिदाता हुआ वह अपनी मेज़ की तरफ़ लपका और
उन कम-अक्ल शाषकों के लिए पत्र लिखने लगा
मुझे जला डालो ! अपने धधकते हुए कलम से उसने लिखा-
क्या मैंने हमेशा सिर्फ सच नहीं लिखा?
और अब तुम मुझे झूठा साबित करने पर लगे हो!
जला डालो मुझे !
अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित
हिन्दी अनुवाद: कुमार विक्रम
----


The Burning of the Booksby Bertolt Brecht
translated by Michael R. Burch
When the Regime
commanded the unlawful books to be burned,
teams of dull oxen hauled huge cartloads to the bonfires.
Then a banished writer, one of the best,
scanning the list of excommunicated texts,
became enraged: he’d been excluded!
He rushed to his desk, full of contemptuous wrath,
to write fierce letters to the morons in power —
Burn me! he wrote with his blazing pen —
Haven’t I always reported the truth?
Now here you are, treating me like a liar!
Burn me!

Thursday, October 6, 2016

राष्ट्रीय असुरक्षा: स्वीडिश कवि टॉमस गोस्ता ट्रांस्ट्रोमर की एक कविता



Tomas Gösta Tranströmer


राष्ट्रीय असुरक्षा 


कनिष्ठ सचिव आगे की ओर झुक कर X जैसी कोई रेखा खिंचती है 
और उसके कान की बालियां डेमोक्लीज़ के तलवार की तरह लटकी नज़र आती हैं.
 
जैसे कोई छींटेदार तितली धरती के प्रतिकूल अदृश्य हो जाती है 
कुछ उसी तरह वह नर-पिशाच खुले हुए अख़बार में लुप्त हो  जाती है.
 
एक ऐसा हेलमेट जिसे किसी ने भी नहीं पहन रखा है वह सत्ता पर आरूढ़ हो गया है. 
मादा-कछुआ पानी के अंदर उड़ कर भाग जाती है.  
 
टॉमस गोस्ता ट्रांस्ट्रोमर (१९३१-२०१५)
स्वीडन के नोबेल पुरस्कृत कवि 

अंगेज़ी से हिंदी अनुवाद: कुमार विक्रम


National Insecurity


The Under Secretary leans forward and draws an X
and her ear-drops dangle like swords of Damocles.

As a mottled butterfly is invisible against the ground
so the demon merges with the opened newspaper.

A helmet worn by no one has taken power.
The mother-turtle flees flying under the water.


Tomas Gösta Tranströmer (1931- 2015)
Nobel Prize Winning Swedish Poet      
Translated by Robin Fulton from the Original Swedish
Courtesy: www.nytimes.com     



Monday, August 29, 2016

Ignorance is not what we do not know



Ignorance is not what we do not know 


Ignorance is not what we do not know
Or remain oblivious of
Indifferent to knowledge unknown to us;
It is there very much in the light that guides us
Bred by knowledge that we proudly boast of
As they say, right there, in between the lines
It resides, like a beloved all set to dump you
While sleeping in your embrace.


Kumar Vikram

Tuesday, August 23, 2016

रियो से आशाएं






रियो से आशाएं 


प्रतियोगिताओं में 
दूसरे नंबर, तीसरे नंबर, 
चौथे नंबर, बीसवें नंबर 
पैंतीसवें नंबर पर आकर 
चोट खाकर मैदान से बाहर होकर 
देश दुनिया परिवार अथवा खुद का 
नाम नहीं रोशन कर भी
जीवन जीया सकता है 
अपने तुम्हे अभी भी गले लगा सकते हैं 
गर्व से तुम्हे अपना कह सकते हैं 
प्रथम आना अभी भी एकमात्र प्राथमिकता नहीं 
ऐसा तुम भी महसूस कर सकते हो
शायद सबकुछ अभी ख़त्म नहीं हुआ है 
शायद अभी भी तुम 
गुमनाम गलियों से बाहर निकाले जा सकते हो 
या फिर निडर होकर 
गुमनामी में धकेले जाने का सोच सकते हो    

कुमार विक्रम 
 

Friday, August 12, 2016

इस प्रतिक्रियावादी समय में



इस प्रतिक्रियावादी समय में 

कब हम सब उनकी ही तरह बोलने लगते है 
इसका इल्म हो पाना भी लगभग मुश्किल है 
ईंट का जबाब पत्थर से देने का सुरूर 
आँख के बदले आँख की भावना
झूठ और सच के फाँक के बीच फंसकर रह जाना 
बातों की पूँछ पकड़ कर गंगा पार कर जाना
कोरस का हिस्सा बनकर जीना  
दरअसल धीरे धीरे काले बादल की तरह 
हम सबको वो आगोश में लेने लगते हैं 
कुछ वैसे ही जैसे 
कोई मादक वस्तु उसका सेवन करने वालों के बीच 
कोई फर्क नहीं करती है 
और सबके सर चढ़ कर एक ही बोली बोलने लगती है

 कुमार विक्रम    

Wednesday, August 10, 2016

इरोम शर्मिला के नाम एक भारतीय ओलिंपियन का पत्र





इरोम शर्मिला के नाम एक भारतीय ओलिंपियन का पत्र


इरोम शर्मिला!
बहुत जल्द तुमसे भी मांगेंगे वो हिसाब
तुम्हारे १६ वर्षों के
तप-उपवास-संघर्ष-पीड़ा-समर्पण-यातना का प्रतिफल
क्या तुम्हे ओलिंपिक में स्वर्ण मिला?
क्या आफ्स्पा हटा?
क्या दमन घटा?
क्या किसी नए सूरज, नयी रौशनी के साथ
कोई नया पौ फटा?
या फिर तुम भी हमारी ही तरह
देश दुनिया के अखबारों में, टीवी चैनलों में
अपने फोटो छपवाने में ही व्यस्त रही
जबकि देश के करदाता
हर पल हर दिन तुम्हारी सफलता के लिए
प्रयत्नरत रहे, लगभग, त्रस्त रहे?

इरोम शर्मिला!
हो सकता है
तुम्हे भी मेरी ही तरह
कुछ बहाने बनाने पड़े
कैसे जहाँ जल्द से जल्द
रातो-रात सारे ऐशो-आराम पा लेने का जुनून हो
कर देकर ही अपने सारे दायित्त्वों से
मुक्त हो जाने का क़ानून हो
वहां मैंने लक्ष्य रखा
सबसे लंबे रास्ते पर चलने का
जैसे तुमने अपने शरीर को स्थिर कर
मन को अडिग रखा
और लाइकोट पहाड़ियों का लघुरूप बन गयी
शायद शरीर को कुछ और गति प्रदान कर
मेरे अंदर भी अनवरत बरसों से 
कुछ वैसी ही अडिगता रही
शायद दोनों ही लाँघना चाहते थे सीमायें
शरीर की और मन की संकीर्णताओं की

इरोम शर्मिला!
किसे दिलचस्पी है
मानवीय संघर्षों की बारीकियों में
खून और पसीने की बदबुओं में
तिल-तिल कर गुमनाम गलियों में
अपने आँखों की चमक को
सहेज कर रखने वालों के ज़द्दोज़हद में
एक थोड़ी सी अच्छी
थोड़े से गैर-मामूली सपनो के सफल करने के
अनगिनत असफल प्रयासों में
खेल के मैदान से हो कर गुजरने वाले
खूससूरत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में
हम तो दरअसल उन तमाशों की तरह हैं
जिसके अंत में मनुष्य मरे या सांड 
दोनों ही स्थितियों में मनोरंजन भरपूर होता है.

कुमार विक्रम     

 (9 अगस्त २०१६ को मणिपुर की मानवाधिकार नेता इरोम शर्मिला ने आफ्स्पा के खिलाफ अपने १६ वर्षो से अनवरत चले आ रहे अनशन को तोड़ने का निर्णय लिया और उसी दिन एक सोशलाइट लेखिका ने भारत के रियो ओलंपिक्स में निराशाजनक प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को दोषी ठहराते हुए उनपर सिर्फ मौज-मस्ती के लिए इन स्पर्धाओं में भाग लेने का आरोप लगाया.)    

Monday, August 8, 2016

ताक़तवर व्यक्तियों की विशेषताएं





ताक़तवर व्यक्तियों की विशेषताएं 

अगर आप समझते हैं कि आपके आदर्शवादी और ईमानदार और मेहनती शख्शियत से ताक़तवर व्यक्ति डर जाएगा या प्रभावित हो जाएगा या कहीं उसके मन के कोने में आपके प्रति कोई अच्छी भावना जग जायेगी तो फिर आपसे बड़ा भोला-भाला कोई और नहीं माना जाएगा क्यूंकि आपके सामने वह आपसे भी अधिक आदर्शवादी, ईमानदार और मेहनतकश बन कर आएगा वेद-पुराण या किन्ही महापुरुषों के सद्वचनों को उद्धरित करते हुए अपने जीवन में खुद कई बार मेहनत का फल मीठा होता है या ईमानदारी सबसे अच्छी नीति होती है आदि कई अनुभवों के बारे में बड़ी शालीनता से आपको समझाते हुए वह नज़र आएगा हालाँकि आप शायद उसे यह समझाने में असफल हीं रहेंगे कि कैसे आपने ईमानदारी और आदर्शों की धज़ज़ियाँ उड़ते देखी हैं और फिर भी आप न जाने क्यों उनमें विश्वास रख कर बैठे हैं जबकि वह ताक़तवर व्यक्ति आपसे मिलने के बाद किसी नीच, मक्कार, चापलूस किस्म के व्यक्ति से मिलते वक़्त उसे नीचता, मक्कारी और चापलूसी के नए गूढ़ सिखाता पाया जाएगा. 

कुमार विक्रम 

Monday, August 1, 2016

सर्वदलीय बैठक



सर्वदलीय बैठक



माहौल दरअसल बिलकुल वैसा ही था
जैसा किसी महान व्यक्ति की मृत्यु पर आयोजित
सर्वधर्म शोक-सभा का होता है
अपने-अपने धर्म की सुपरिचित पोशाकों में
सिर्फ अपने धर्म के श्लोकों
अथवा आयतों का पाठ करते हुए
कुछ इस भावना के साथ
कि सभी धर्म मूलतः एक से हैं
उस परमात्मा तक पहुचने तक
बस अलग अलग पथ हैं
ठीक उसी तरह जैसे देश का विकास
सबों का एक मात्र उद्देश्य है
वहीं बैठक के बाहर हर दल के भक्त
धर्मों के बीच की असमानताओं को
बढ़ चढ़ कर बांच रहे थे
जो अंदर बैठे दलों के प्रतिनिधियों ने ही
उन्हें कक्षा कार्य के रूप में दिए थे

कुमार विक्रम

Sunday, July 31, 2016

दरिद्रनारायण की सेवा






दरिद्रनारायण की सेवा



राजा को अवगुण पसंद नहीं थे
उसने अपने पास सिर्फ गुणों को रख कर
सारे अवगुण अपने वज़ीरों में बाँट दिए 
वज़ीर ठहरे वज़ीर
उन्होंने उन अवगुणों से
बचे-खुचे गुण छांट कर
अपने पास रख लिए
और बाकी सारे अवगुण
अपने अफ़सरान में बाँट दिए
अफ़सरान ठहरे अफ़सरान
उन्होंने अवगुणों पर नक़ली गुण का पानी चढ़ाकर
चमकते गुणों के हार
अपने गले में डाल लिए
और बाकी सारे अवगुण जनता में बाँट दिए
इस तरह सर्वगुणसम्पन्न राजा के अधीन
दरिद्रनारायण के राज की स्थापना हो पाई
जिनकी सेवा
राजा, उसके वज़ीर और अफ़सरान का
परम कर्त्तव्य बन पड़ा
और उस सेवा को भी
अपने गुणों में शामिल कर लिया

--कुमार विक्रम

Friday, July 29, 2016

जब मैं महान कवितायें लिखता था




जब मैं महान कवितायें लिखता था


यह तब की बात है
जब मैं महान कवितायें लिखता था
और खुद उन्हें पढ़ कर 
अभिभूत सा रहता था
कुछ कुछ धुंधला सा
ख्याल आता है कि
विश्व के हर कोने से
कवि-वर मुझसे कविता
और काव्य शास्त्र सीखने आते थे
अब न वो मैं रहा
न ही मेरी कविताई रही
न ही मेरे शब्दों में कोई तरुणाई रही
रह गयी तो सिर्फ उन शब्दों की ऐंठन
जिनसे मैं अब सबको बांध कर
पुनः अपने लिए
एक महाकाव्य रचना चाहता हूँ

कुमार विक्रम

Thursday, July 28, 2016

Invitation Cancelled-III





Invitation Cancelled-III


Perhaps
As a way of instant communication
In unforeseen situations
When we cancel much planned engagements impromptu
And prefer to convey to the guests
Via neighbours or common acquaintances
(At the back of mind thinking of a detailed sharing of events at a later indefinite date)
He would have put out advertisements of
"Invitation Cancelled" " Invitation Cancelled"
As he had to confront more urgent work
Like searching for the missing
Attending the injured
Mourning the dead
Or just suffering in silence
Or praying for the safety of the invitees
Or some work requiring lonely engagements
In a crowded noisy ambience
As if reminding him of the geological definition of a valley--
' a depression in the hills'.

Kumar Vikram

Wednesday, July 27, 2016

Invitation Cancelled-II





Invitation Cancelled-II

" Come over sometime with your family"
My poet-friend from the valley
Had invited me warmly
"These days it is better",
His words had already conjured up for me
Images of inviting snow-capped peaks
Musical streams, tall Chinars lined up
To greet me with a guard of honour of sorts,
Before he had added with a chuckle
" Like a patient etherised upon a table".
It was meant to evoke an intellectual laughter for sure
But I had taken it seriously
Now making me wonder
If the bold headlined
" Invitation Cancelled" " Invitation Cancelled"
Has now been put out by him for me
Or somebody just wrote "cancelled" in a hurry
Meaning "postponed"...

Kumar Vikram

Tuesday, July 12, 2016

Invitation Cancelled



Pablo Picasso, The Tragedy, 1903
Image Courtesy: 
http://www.wikiart.org


Invitation Cancelled

I did not cancel it
Am no body to do so
It cancelled itself out
Placed itself right on the top
Unlike the fine prints of ‘Conditions Apply’
Which remain hidden somewhere underneath
The brochures of insurance companies--
Rather like the hawkers of fish market
It cried hoarsely and in unison
“Invitation Cancelled’, ‘Invitation Cancelled’
After all what do you expect
In this morbid valley of broken vows
When all come in to bemoan
Uninvited, unsolicited, unproposed
Erasing the distinctions
Between you and me
Between twilight and wee-hours
Between death and life
Between reality and illusion
Between images real and those in the mirror

Between hosts and guests

Kumar Vikram        

Tuesday, April 12, 2016

पानी और पैसा






पानी और पैसा      


पानी की तरह पैसा बहाना 
कोई उन्हें समझाए 
कि सिर्फ एक मुहावरा ही है 
उन दिनों ईजाद किया हुआ 
जब पानी सब तरफ लबालब था 
और पैसा अभी देवता नहीं बना था 

कोई उन्हें समझाए 
पैसे से पानी पर काबू पाना 
मानो ऊँगली को आँखों पर रख   
सूरज को ढक लेने का 
भ्रम पालने जैसा है 

कोई उन्हें यह भी समझाए 
कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के कारण होगा 
कोई मुहावरा नहीं है 
बस कुछ मसखरों द्वारा 
प्रलय से पहले 
उसकी खिल्ली उड़ाने का जत्न करने जैसा है 

कुमार विक्रम 


Wednesday, March 9, 2016

"उद्भावना" में प्रकाशित मेरी एक कविता 'नदियां

नदियां


कहते हैं सभ्यताएं नदियों के किनारे बसती हैं 
लेकिन मुझे तलाश है एक नदी की
जो सभ्यताओं के सहारे टिकी हो
मेरा नदियों से ख़ास कोई रिश्ता नहीं रहा है
न तैराक बन पाया, न ही प्रकृति प्रेमी
किताबों से, आस-पास से एकत्रित जानकारियों से
यह समझता हूँ कि मेरी प्यास बुझाने को
कहीं न कहीं किसी न किसी नदी का जल ही
मुझतक चलकर पहुँचता है
और यह इल्म कि नदियों की मेहनत को
बस यूँ ही गौण मानकर चलना
न जाने कितनी सभ्यताओं के
प्यास से छटपटा कर
ग़ुम हो जाने का कारण बनता रहा है
मुझे सालता रहता है
क्यूंकि नदियां पहाड़ नहीं हैं
जो बस अपनी जगह टिके रहते हैं
अपनी ऊंचाई से ही अभिभूत
जिनसे मिलने और संवाद के लिए
उनके घर चलकर जाना होता है
जबकि नदियां
पहाड़ो के सामाजिक दायित्वों को निभाने
दर-दर, शहर-शहर, गाँव- गाँव
पहुँचती रहती हैं
नदियां सूरज भी नहीं
अपने तेज और दूरी से ही
खुद में यूँ खोया हुआ
मानो रौशनी बिखेरना
कोई दफ्तरी धर्म हो
जिसे बिना किसी राग और द्वेष के
समान भाव से पूर्ण करने का स्वांग
करना होता है
जबकि अन्धकार का साम्राज्य
दिन-प्रति-दिन, रात-प्रति-रात
उसके नाकों तले सशक्त होता रहता है
नदियां हवा भी नहीं हैं
निराकार, निर्विकार और
स्पर्श की अनुभूति से ही
अपनी सरूपता दर्शाती हुई
जिसके बगैर
जीवन की कल्पना असंभव तो है
मगर जिससे कोई
उतना ही निरपेक्ष रहता है
जितना कोई अपने अनुवांशिक तत्व से होता है
और जिसकी अनुपस्थिति का अनुभव
संग्रह करना सर्वथा असंभव होता है
शायद सभी प्राकृतिक उपहारों में
नदियों को ही सबसे मानुषिक,
अतः सबसे दुरूह कार्य सौंपा गया है
जिन्हें अर्धनिर्मित मानवों के
गुणों और अवगुणों से निबटना होता है
उनके नैसर्गिक प्यास के साथ-साथ
उनके छल-कपट, विष, मल
आदि भी ढोना होता है
और इस तरह नदियों को बनना होता है
मध्य की एक कड़ी
अर्ध-मानव, अर्ध-प्राकृतिक
कुछ-कुछ उन स्त्रियों की तरह
जिनके नाम उन्हें दिए गए हैं
जिनके लिए माँ, मैया जैसे सम्बोधनों को
गढ़ना बड़ा आसान है
पर जिनके एक तरफा मातृक स्नेह
के बोझ को समझने के लिए
जल के उन बूँद बूँद में भीगना है
जिनसे हमारे शरीर की,
पाँव तले ज़मीन की
बुनावट है.

कुमार विक्रम