Saturday, November 1, 2014

मेरे पास कहने को कुछ खास नहीं है




मेरे पास कहने को कुछ खास नहीं है 



मेरे पास कहने को कुछ खास नहीं हैं 
बस आडम्बरी शब्दों का एक ढेर है 
जिन पर बैठ मैं उनके तरह तरह के पर्यायवाची रू
ढूंढतागढ़ताबोलतालिखता रहता हूँ 
कुछ वैसे ही 
जैसे कोई बड़ा नेता 
हर तरह के लिबासटोपीरंग पहन पहन कर 
खुद को बहरूपिया सा पेश करने का स्वांग रचता रहता है  
दरअसल शब्द कोशोसमान्तर कोशोंविश्व कोशो  के बगैर 
मेरी अनुभूतिअभिवयक्तिअनुभव 
उस कुबेर की तिजोरी के सामान हैं 
जिनसे अगर काला धन का एक एक कतरा निकाल दिया जा
तो अंततः गाढ़ी पसीने की ख़ुशबू से सुगन्धित 
एक पैसा भी ना मिले  
आश्चर्य नहीं कि दिन प्रति दि
सरल शब्दों को और भी विकटदुरूहऔर समझ से परे 
बनाने-गढ़ने की अंतहीन परंपराओं को 
सुढृढ करने की हर प्रयास में 
मैं हमेशा तत्परता से शामिल रहता हूँ 
ठीक उसी तरह जैसे 
सरलमीठीसादासुलभ नदियां 
दौड़ दौड़ कर तत्परता से 

खारेरहस्यमयघाघ समुद्र में कूदती जाती हैं.   

 कुमार विक्रम 



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