Friday, September 26, 2014

लुप्त होती भाषाएँ

 
 
 
 
 

लुप्त होती भाषाएँ 

 
कहते हैं 
हज़ारों भाषाएँ लुप्त हुई जा रही हैं 
वे अब उन पुराने बंद मकानो की तरह हैं 
जिनमे कोई रहने नहीं आता  
मकान से गिरती टूटी-फूटी कुछ ईंटें
बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए 
घर के मंदिर में बेढंग शब्दों जैसे 
सहेज कर रख ली गयी हैं 
जैसे बीती रात के कुछ सपने 
दिन के उजाले में
आधे याद और आधे धुंधले से 
हमारा पीछा करते रहते हैं 
लुप्त होती भाषाओं के नाम 
अजीबो-ग़रीब से लगते हैं
साथ ही यह सूचना भी 
कि उन्हें जानने-बोलने वालों की संख्या 
कुछ दहाई अथवा सैकड़ों में ही रह गए हैं 
कैसा वीभत्स सा यह समय लग रहा है 
जब प्यार की भाषा 
अजनबियों के सरोकार जानने की भाषा 
बीमार पड़े कमज़ोर वयक्तियों की 
जुबान समझने की कला
या फिर उसका भाषा-विज्ञान 
जानने-समझने-बोलने वालों की संख्या 
दिन पर दिन घटती जा रही है. 
 
कुमार विक्रम

Thursday, September 18, 2014

घर के पुरुष का आगंतुक के लिए ट्रे में चाय लेकर आना



घर के पुरुष का आगंतुक के लिए ट्रे में चाय लेकर आना 

शायद ज़रुरत से ज़्यादा ही आश्वस्त 
शायद झेंप जैसी किसी भावना को 
आधुनिक परिधानों 
जैसे बरमूडा और टी -शर्ट से ढंकते हुए 
या ध्यान अपनी ओर से 
हटाने की कोशिश करते हुए 
जैसे की हाथों में ट्रे हो ही ना 
इधर-उधर की बातचीत करते हुए 
आगंतुक को घर ढूढ़ने में 
कोई परेशानी तो नहीं हुयी 
यह जानकारी लेते हुए 
शायद परंपरा के विरूद्ध 
एक ही हाथ में ट्रे पकडे हुए 
वह हिम्मत कर प्रवेश करता है 
एक ऐसी दुनिया में 
जहाँ माँ, बहन, पत्नी, बेटी 
अथवा नौकरानी के सिवा 
कोई और दाखिल नहीं हुआ है 
और यकायक कई सवालों से 
अपने-आप को घिरा पाता  है
जो ज़रूरी नहीं पूछे ही जाएँ 
लेकिन वातावरण में
उनकी अकाट्य उपस्थिति होती है 
'शायद पत्नी बीमार होगी''
माँ कुछ ज़्यादा ही उम्रदराज़ होंगी 
बहनों की शादी हो गयी होगी 
अभी बेटी बहुत छोटी होगी
इकलौता होगा  
नौकरानी रखने की हैसियत नहीं होगी
उसे भी लगता है 
मानो किसी पहाड़ी की चढ़ाई उसने की है 
और 'अतिथि देवो भव''
अपने पत्नी अथवा माँ 
अथवा बहन अथवा बेटी 
अथवा किसी नौकरानी के कंधो पर 
सदियों सवार होकर नहीं 
खुद एक बार गहरी सांस लेते हुए 
चरितार्थ करने की कोशिश की है.       

कुमार विक्रम 
 
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''हिंदी समय' एवं ' उद्भावना' में प्रकाशित