Thursday, August 28, 2014

सच का डर



सच का डर 


सच बोलने और डर का 
कुछ अजीब ही रिश्ता है 
सच बोलते बोलते 
डर साथ साथ होता है 
सच बोलने से पहले भी 
डर ठीक पीछे ही खड़ा रहता है 
जैसे बड़ी होती लड़की के पीछे 
उसका बचपन छाये में खड़ा होता है 
सच बोलने के बाद 
डर पूरी तरह पीछा नहीं छोड़ता 
वो अपने अस्तित्व को 
और विदूप बनाने में लग जाता है
सचमुच यह विचारणीय है 
कि सुकरात सरीखों को 
सच बोलते और दुहराते हुए 
ज़हर का घूँट पीते हुए 
डर की अनुभूति हुई होगी 
या नहीं? 
इतिहास के पन्नों में 
सुकरात-सरीखों पर लिखे गए 
जीवनियों में 
शायद ही इस मसले का 
कोई हल हमें मिल पाये 
क्योंकि उनमे सच बोलने का डर नहीं 
बल्कि सच बोल चुके व्यक्ति की 
विजय-गाथा होती है 
उसका हल शायद वहीँ मिले 
जहाँ कोई अभी किन्ही गुमनाम गलियों में 
सच डरते डरते बोल रहा हो 

कुमार विक्रम

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