Tuesday, August 26, 2014

पेड़ से लटक कर एक प्रेमी युगल का आत्महत्या करना

पेड़ से लटक कर एक प्रेमी युगल का आत्महत्या करना
तुम दोनों इसी लायक थे शायद 
जब हमारे धमनियों मे विष पिरोया जा रहा था
तब तुम प्रेम की कोई कहानी गढ़ रहे थे
तुम दोनों का मारा जाना तय था
बस कब और कहाँ और किस तरह
इतने का ही सवाल रह गया था
तुम्हारे लिए न जाने कितने महत्वपूर्ण काम पड़े थे 
अपने परिवार कुल और गोत्र  
उप-जाति और जाति 
अपने धर्म के बारे में  
शेखियाँ बघारनी थी
अपने यहाँ बनने वाली सब्ज़ियों की खुशबू 
अपने त्योहारों के रस्मो-रिवाज़
अपने कपड़े पहनने के रंग ढंग 
अपनी भाषा-बोली के एक-एक लफ्ज़ को
एकमात्र सत्य की तरह पीना था 
कई अंतहीन बेड़ियों से खुद को बांधकर 
और मन ही मन कई तरह की गाँठों में बँधकर  
अपने और अपनों को सर्वश्रेष्ठ मान जीवन जीना था
अपने और अपनों से दीगर 
हर-एक शक्श को दोयम मान कर सड़ना था 
धिक्कार है तुम्हे!
जो तुम इन महान आदर्शों 
सदियों से चले आ रहे
पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों को छोड़कर
प्रेम जैसी फ़ाज़िल बातों में फँस गए
निश्चित ही तुम दोनों का मारा जाना था 
कुमार विक्रम   

No comments:

Post a Comment

To Father: A Poem

To Father Sometimes you should pick up poetry And read them aloud Feel the sound of words Search for their varied meanings In dictionaries a...