Tuesday, August 5, 2014

छोटी बच्ची की बड़ी दुनिया

 
 
 
 
छोटी बच्ची की बड़ी दुनिया 
 
लगता है पूरा ब्रह्माण्ड ही 
समाहित हो गया है 
मेरे कमरे में  
और मेरे सामने
परदे के पीछे छिपी बच्ची 
कहती है मैं पलंग के नीचे छिपी हूँ 
घर की एकलौती बच्ची 
कहती है दीवार पर चित्र
उसने नहीं बनाये हैं 
अधपिये दूध का गिलास
सामने मेज के कोने पर ही रखकर 
कहती है 'फिनीश''कर लिया 
दौड़ दौड़ कर कहानियाँ गढती है 
दुनिया इतनी बड़ी है उसकी
कि उसके क ख ग घ 
उसकी ए बी सी डी में
एक सांस में ही घुल-मिल जाते हैं 
इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ 
कि बाहर क्रान्ति मची है 
दोनों के बीच.   
 
कुमार विक्रम