Friday, July 25, 2014

चुप्पी के तरीके





चुप्पी के तरीके 

चुप रहना चुप्पी के तरीकों में 
सर्वश्रेष्ठ तरीका नहीं माना जाता 
वैसे ही जैसे यह ज़रूरी नहीं 
कुछ न कुछ बोलते रहना 
कुछ कहने के तरीकों में 
शुमार हो ही जाए
दरअसल कुछ-कुछ बोलते रहना 
चपर चपर करते रहना 
शोर मचाते रहना 
चुप्पी की कला के
श्रेष्ठयम तरकीबों में से है
शोर के बीच चुप्पी 
कुछ इस कदर बैठ जाती है 
मानो बच्चों के बीच
कोई बौना छुप गया हो
कुमार विक्रम 

Monday, July 14, 2014

मेरा शैतान, तेरा शैतान


 मेरा शैतान, तेरा शैतान

माँ-बाप बनाने तो निकले थे बच्चे को इंसान
पर रास्ता काट गए मुल्ला और पंडित
बच्चे बन गए हिन्दू या मुसलमान
उल्टे अब आलम यह कि कुछ तो देखा देखी में
और कुछ यारी अथवा ऐयारी में
अच्छे खासे इंसान वापिस बन गए हैं
फिर से हिन्दू और मुसलमान
और मानो इतनी मासूमियत कम नहीं थी
जो वे मानते थे
कि उनके अलग अलग हैं
खुदा और भगवान
जो अब वे यह समझ बैठे हैं
उनके हैं अलग अलग शैतान

कुमार विक्रम


 

Saturday, July 5, 2014

Post-Colonialism and Beyond: Reading Edward W. Said in the Context of Contemporary Dalit Literary Discourse in India



Edward W. Said (1935-2003)

You are requested to go to the link below to read this article. Thanks.

https://www.academia.edu/7554583/Post-Colonialism_and_Beyond_Reading_Edward_W._Said_in_the_Context_of_Contemporary_Dalit_Literary_Discourse_in_India

Tuesday, July 1, 2014

जिन्हे खुद पर विश्वास नहीं होता वो नास्तिक बन जाते हैं

जिन्हे खुद पर विश्वास नहीं होता वो नास्तिक बन जाते हैं

'The Light Within', photo by
Mateusz Staniewski
Courtesy: http://static.pechakucha.org
तुम तो किसी भगवान
अथवा शैतान की प्रतिमा को गिराकर ही
अपने दायित्व से मुक्त हो जाना चाहते हो
आश्चर्य नहीं 
हर वर्ष रावण-दहन की
औपचारिक मुखौटी संस्कृति के 
इतने कायल हो तुम कि 
अपने आस-पास पल-पल बनते रावण 
तुमसे गलबहियां करता  
तुम्हारे साथ बर्गर खाता हुआ 
आदि तुम्हे छू तक नहीं जाता   
सचमुच कभी कभी ऐसा महसूस होता है 
कि जिन्हे खुद पर विश्वास नहीं होता है,
वही शायद नास्तिक बन जाते हैं 
क्योंकि कई बार देखा है 
मंदिरों-मस्जिदों के पास नहीं फटकने वाले 
बाहर भीखमंगों के साथ बैठ जाते हैं
जैसे किसी राजनीतिक पार्टी की मुखालफत करने वाले 
उसके पोस्टर लगाने की ठेकेदारी उठा लेते हैं
शायद आस्था का प्रश्न इतना भी विकट नहीं 
मानो तो पत्थर वरना मनुष्य
और सच कहूँ तो अखबारों में
मैंने भी पढ़ी ही वो ख़बरें कि 
समुद्र की लहरों का सामना
करने की कामना करने वाले 
होटल की स्विमिंग पूल में ही
डूब कर खप गए
इससे तो शायद अच्छा है कि 
कुछ अगरबत्तियों की खुशबु ही 
मंदिरों-मस्जिदों में बिखेर दी जाए
ताकि अगरबत्ती बनाने वालों और 
खुशबुओं की चाह रखने वालों के बीच
कुछ तो रिश्ता कायम हो जाए. 

  --कुमार विक्रम