Friday, April 25, 2014

जो स्थिर और मज़बूत घर की तलाश में हैं: एक कविता बचाने की कोशिश मे एक कविता

 
Image Courtesy: http://www.someecards.com
 जो स्थिर और मज़बूत घर की तलाश में हैं

दोस्तों!
इतना सुकून भी क्या कम है
कि जब घर को थी मेरी ज़रुरत
मैं था उसके पास ही
मैं गलियों में दौड़ दौड़ कर
नहीं कर रहा था अपने ही घर की मुखालफत
मैं अपने ही घर की दीवारें नहीं गिरा रहा था
उसकी जड़ें मैं नहीं खोद रहा था
मैं अपने दोस्तों से कह रहा था
ज़रा इस घर की संरचना तो देखो
तुम्हारा भाई इंजीनियर है
उससे ही पूछ लो
चार-पांच खम्बों पर खड़ा यह घर
एक या दो पर नहीं रह सकता खड़ा
तुम मज़बूत और स्थिर घर की तलाश में
दरअसल उसे ढाने और गिराने का काम कर रहे हो
हमारी माँ इतना अच्छा खाना बनाती है
उससे ही पूछ लो
कैसे बिगड़ जाता है ज़ायका
हल्दी के ज़्यादा पड़ जाने से
धनिया के कम पड़ जाने से
चुटकी भर नमक के वज़ूद को नकार देने से
इतना ही सुकून काफी है कि जब
घर गिराने वाले आये बुलडोज़र
तो मैं भी उस भीड़ में शामिल हो गया
जो यह समझ रहे थे कि
बुलडोज़र से बकझक है बेवकूफी
ज़रा उस ड्राइवर को ही बुलाकर
चाय-पानी पिलाकर
समझा लो कि तुम हमारा नहीं
अपना ही घर गिराने पर आमादा हो
टूटे हुए  घरों की दास्तान भीं
शायद हममें से किसी ने उसे सुनायी थी
वो कुछ पुराने किस्से
जिसमे बच्चे सूनी आँखों से भविष्य की ओर देखते थे
और रात के अन्धकार मे सुबक सुबक कर रोते थे
और जहां तक आता है याद
वह ड्राइवर चाय पीकर
बुलडोज़र पर वापिस चला गया था
शायद उसने अपने मालिकों को ज़रूर कोइ
झूठी कहानी सुना दी होगी

नहीं तो कहाँ से आता मुझे यह इतना सा भी सुकून.

कुमार विक्रम








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