Friday, November 8, 2013

'एक वैश्विक गंवार के सपने': 'दोआबा' में प्रकाशित मेरी एक कविता





 आज प्रस्तुत है मेरी यह कविता जो दो अन्य कविताओं  ('पिता की मृत्यु से एक संवाद' एवं 'पीठ पर गुदा हुआ  ब्लर्ब') के साथ श्री जाबिर हुसैन द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पत्रिका 'दोआबा' के अंक १३ ( अक्टूबर 2012) में प्रकाशित हुई थी.


 एक वैश्विक गंवार के सपने


गाँव के मध्य में अवस्थित
हे बरगद के वृक्ष!
रहना तुम यूँ हीं खड़े पत्थर की भाँति
ताकि मैं जब लौटूं गाँव वापिस
पहचान सकूँ गाँव को उसके केंद्र से
हे बरगद के वृक्ष तब्दील न हो जाना
छोटे-मोटे दो, पांच अथवा दस वृक्षों में!

गाँव की औरतें!
तुम यूं हीं रहना सिसकते
ताकि जब मैं लौटूं
तुम्हारे जीवन पर लिख सकूँ
कुछ रिपोर्ताज, कुछ संस्मरण
कुछ कवितायेँ, कुछ कहानियाँ
खीच सकूँ कुछ रंग-बिरंगे चित्र

गाँव की झोपड़ियां!
तुम रहना यूँ ही टूटी फूटी
ताकि जब मैं लौटूं
तो अपलोड कर सकूं तुम्हारे कुछ फोटोज़
अपने फेसबुक पर, ब्लॉग पर
शेयर कर सकूँ बचपन की
उन चिलचिलाती दोपहरियों को
जो बिताये थे मैंने तुम्हारी
रौशनी भरी छाया में

गाँव के बच्चों!
तुम यूँ ही खेलते रहना
साइकिल की फटी हुई टायरों के साथ
ताकि जब मैं लौटूं
अपने बच्चों को दौड़ा सकूँ
तुम्हारी उन टायरों के साथ
और तालियां बजा-बजाकर
ईश्वर को दे सकूँ धन्यवाद
जीवन के सारे सपने पूरे करने के लिए

गाँव तुम गाँव ही रहना!
ताकि मेरे लौटने की सम्भावना बनी रहे
गाँव तुम गाँव ही रहना!
शहर में तब्दील नहीं हो जाना!
क्यूंकि वहाँ तो बसते हैं कई षड्यंत्रकारी
संस्कृत्यों और स्म्रृतियों के दलाल व व्यापारी
तुम्हारे रक्तरंजित जलमग्न
शरीर के कंधों पर हो सवार
तुम्हारे लिए एक वैश्विक सपनों को बुनते हुए
बेचते हुए.

कुमार विक्रम


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