Wednesday, October 23, 2013

'पकता हुआ पुरुष': मूल अंग्रेजी से श्री मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित एवं 'पहल' में प्रकाशित मेरी एक कविता


यह कविता पहले हिंदी अनुवाद में 'पहल 'में प्रकाशित हुयी, और उसके बाद मूल कविता 'A Man Cooking' 'Indian Literature' journal  में प्रकाशित हुयी.


अपने रसोईघर में पकते हुए पुरुष को अपने और अपनी दुनिया को
कई तरह से समझाना होता है क्योंकि वह एक ऐसे फिसलन-भरे इलाके
में है जहाँ उसे एक पूरी व्यवस्था को पचाना है उस महिला
की तरह जो दफ्तर में किसी ऊँचे पद पर बैठी हुई है;

उसके पूर्वज रसोईघर में खड़े हैं और मज़ा किरकिरा करने के लिए
उसे डांट रहे हैं जबकि उसकी पत्नी जो स्वस्थ है और मरणासन्न नहीं है
पश्चिम की नक़ल पर ड्राइंग रूम में बैठी अखबार पढ़ रही है जहाँ से सुबह का
खुशनुमा आसमान दिखाई देता है;

पकते हुए पुरुष का रसोईघर कोई पिछवाडा नहीं है जहाँ रोज़
की तरह गैस का चुल्हा जलता हो, बर्तन खनखनाते हों, भोजन खदबदाता हो
बल्कि वह एक खासी अहम् जगह बन चुका है जहाँ वह ऐसे काम
में लगा है जिसका मज़ा ही कुछ और होना है;

पकता हुआ पुरुष सोचता है किस तरह उसकी मांओं बहनों बेटियों पत्नियों ने इसी जगह
खड़े-खड़े या बैठे हुए इतने दिन महीने
मौसम बिताये होंगे जबकि वह यहाँ नहीं बल्कि ड्राइंग रूम में किसी मेहमान
के साथ वक़्त गंवाता रहा;

उसके हांथों को कच्ची सब्जियां, कच्चे मसाले, कच्चे प्याज, कच्चे आलू
खासे अटपटे लगते हैं जिनसे उसका जुडाव सिर्फ एक व्यापारिक स्तर पर है
जब वह उन्हें ख़रीद या बेच या उगा रहा था;

उसकी कच्ची संगत में नितांत अजनबी उसके हाथ हमेशा से पकी हुई
सब्जियों और दालों से उठती हुयी प्याज और मसालों की
खुशबु के अभ्यस्त रहे है जिसे पैदा करना उन्हें नहीं आता
सिर्फ उसका स्वाद लेना आता है;

पकता हुआ पुरुष एक ऐसे पुरुष की तरह है जो अपने पूर्वजों
के पिछले गुनाहों से, एक परिपक्व जीवन के हासिल के रूप में
पैदा हुए कच्चे-तीखे स्वाद से, रसोईघर की अफ़रा-तफ़री के प्रति
उनकी उदासीनता से खुद को मुक्त करने की कोशिश में लगा है;

पकता हुआ पुरुष दरअसल ऐसा पुरुष है जो अपने घर का पुनरूदध्ार
करने की सोंच रहा है, चुपचाप नेपथ्य को सजा रहा है, नए सिरे
से ग्रीनरूम की पुताई कर रहा है, अपने पूर्वजों की मटमैली पीठ खुरच रहा है,
औरतों की भूमिका में आ रहा है, अपने घोंसले के दो-चार तिनके
फिर से सहेज रहा है.

कुमार विक्रम

अनुवाद: मंगलेश डबराल

पहल-८५, फरवरी २००७ अंक में प्रकाशित

मूल कविता आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं और नीचे दिए हुए इमेज का विवरण भी जान सकते हैं
 http://aboutreading.blogspot.in/2010/12/man-cooking-poem.html