Thursday, September 26, 2013

'एक भावी हत्यारे का बयान ': 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित कविता के पांचवे 'सालगिरह' पर

'नया ज्ञानोदय' के सितम्बर २००८ के अंक में मेरी यह कविता तीन अन्य कविताओं के साथ प्रकाशित हुई थी--अन्य कविताऍं थीं, 'प्राइवेट जोक', 'नुस्खा', एवं 'पिताजी का गुस्सा'. सबसे पहले तो मैं शुक्रगुज़ार हूँ कविवर श्री असद जैदी और श्री मंगलेश डबराल जी का जिन्होंने, इन कविताओं को ड्राफ्ट स्टेज पर पढ़ा, सराहा था और कुछ बहुमूल्य सुझाव दिए थे. जैसे कि असद जैदी साहब ने कहा कि इस कविता का शीर्षक 'एक भावी हत्यारे के विचार'  की जगह  'एक भावी हत्यारे का बयान' रखा जाना ज़्यादा उपयुक्त होगा. डबराल साहब ने भी इसका समर्थन किया और इसे  मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. कविता सत्ता और साम्प्रदायिकता एवं सत्ता और सामाजिक अपराधीकरण से तो निश्चित रूप से सरोकार रखती है, लेकिन मैं सिर्फ यह जोड़ना चाहता हूँ कि जितना यह सत्ता और साम्प्रदायिकता और अपराधीकरण के नेक्सस से प्रेरित है, उतना ही व्यकितगत स्तर पर विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के बिखराव में हमारी संलिप्ता और उससे अपने आप को बरी करने की असफल कोशिश से भी जूडी है. ज़ाहिर है अपनी कविता के बारे में और कुछ कहना जोखिम भरा होगा, इसीलिए आप पाठक हीं इसके मूल्यांकन की ज़िम्मेदारी को निभाये तो बेहतर और उचित होगा. हाँ, इतना ज़रूर है कि शायद मेरी पहली कविता संग्रह (जो पिछले एक दशक से तैयार हो रही है!) का शीर्षक इसी कविता से लिया जाएगा. मूल रूप में कविता की पंक्तियां कुछ दूसरे तरह से संरंचित थीं, लेकिन यहां पर मैं नया ज्ञानोदय में कविता जिस रूप में प्रकाशित हुई वही साझा कर रहा हूं.     



एक भावी हत्यारे का बयान

मुझे अब पूरा-पूरा हो चला है विश्वास
कि जब कभी
भी मेरे हाथों किसी की होगी हत्या
मुझे ही ज़िम्मेदारी मिल जाएगी
उस हत्या की तफ्तीश करने की

मैं दल-बल उस जगह पहुचूंगा यकायक
और मुझे मालूम है सारे हतप्रभ होंगे
हत्यारे की सफाई से,
न कोई हत्या के औज़ार,
न कोई उँगलियों के निशान
न ही किसी इरादे की भनक

वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं पाया जाएगा और सब
मुझसे ही पूछते होंगे
क्या दिशा हो तफ्तीश की और
मैं पूरी गंभीरता से
एक लम्बी फेहरिस्त बनवाता जाऊंगा चीज़ों की
फटे हुए तकिये
और टूटे हुए कप-प्लेट और बिखरी हुयी किताबें
और बेतरतीब रखी हुई कुर्सियां
और ज़मीन पर गिरी हुई
दीवार घडी
और अपनी जगह से हिला हुआ पलंग

जिस जगह और जिस रूप में
लाश पाई गयी होगी उसके
चारों ऒर चौक से निशान लगाते हुए
मुझे याद आएगा
वो लम्हां, जब दोनों हाथों से
मैंने उसका गला
अंतिम बार दबाया था,
और था मुझे ऐसा लगा जैसे एक फीकी
मुस्कान के साथ उसने दम तोड़ दिया था,

लेकिन इन सबका भान
किसी और को नहीं हो पायेगा
और बार-बार मुझे अपनी हाथ की सफाई पर
गर्व आता रहेगा
हालाँकि सबकुछ सबको बताकर
एकाएक कोलाहल पैदा कर
सबका ध्यान मेरी ऒर कर देने की इच्छा भी
बराबर मुझे उकसाती रहेगी

हालाँकि मुझे पता है कि मेरे सनकीपन से वाकि़फ
मेरे सह-जासूस मेरी खुलासों पर फीकी मुस्कान
भी नहीं फेकेंगे और
फिर उन्हें तो सिखाया जा चुका होगा
की हत्यारा उनके बीच से नहीं,
बल्कि किसी एक
अन्धकार से निकल
दूसरे अन्धकार में छिप जाता है.

और फिर मैं आश्वस्त हो जाऊंगा कि सभ्यताओं
के भूगर्भ में समाने
पर पूरी गंभीरता से चुपचाप उसकी खोजबीन
करने की एक लम्बी
परंपरा मुझे इस कश-म-कश से
ज़रूर उबार लेगी.     

कुमार विक्रम

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