Friday, August 23, 2013

'पिता की मृत्यु से एक संवाद': 'दोआबा' में प्रकाशित मेरी एक कविता

 मेरी यह लम्बी कविता दो अन्य कविताओं  ('एक वैश्विक गंवार के सपने' एवं 'पीठ पर गुदा हुआ  ब्लर्ब') के साथ श्री जाबिर हुसैन द्वारा संपादित एवं प्रकाशित पत्रिका 'दोआबा' के अंक १३ ( अक्टूबर 2012) में प्रकाशित हुयी थी. इधर कुछ दिनों से यूनिकोड के माध्यम से हिंदी टाइपिंग कर पा रहा हूँ और सच मानो एक अजीब स्वतंत्रता का अनुभव कर रहा हूँ. एक तरह से इस स्वतंत्रता को मनाने के लिए ही इस कविता को यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. आगे शायद अब कुछ पोस्ट्स हिंदी में भी कर पाऊंगा. यहाँ प्रस्तुत कविता और 'दोआबा' में प्रकाशित कविता के बीच कहीं कहीं वर्तनी आदि का कुछ फर्क आ गया हो--वो भी यूनिकोड के कारण ही शायद. खैर.  



पिता की मृत्यु से एक संवाद


1
पिता
मुझे तुम्हारी मृत्यू
अब बोर करने लगी है

जब थी यह नयी नवीली
तब नम व अश्रुपूर्ण आंखों से ही सही
हमने किया इसका स्वागत बड़ी गर्मजोशी से
साज-श्रृंगार, मान-सम्मान, आवभगत किया दिल खोलकर
दौड़-दौड़कर हमने इसके सारे नखरे उठाए
सर-आंखों पर बिठाया
पर अब धीरे-धीरे यह हो रहा है आभास
तुम्हारी मृत्यु को तुमसे नहीं है कोई सरोकार
हमने समझा जैसे हम तुम्हारे हैं
वैसे ही तुम्हारी मृत्यु भी तुम्हारी है
और हमारा उससे सीधा गहरा रिश्ता है
पर मृत्यु तो शाम में स्कूल में बजने वाली घंटी है
वहाँ के दिनभर की शिक्षा-दीक्षा, खेल-कूद
भविष्य के लिए बनाए गए सारे सपने
उसके लिए बेमायने हैं
मानो शरीर का कोई ऐसा अँग
जो शरीर से बाहर है, विमुख है
एक ऐसा हिस्सा जो शरीर के विलीन होने के बाद
अपना वजू़द जताने आता हो,

एक सूदखोर साहूकार की तरह बही-खाता लेकर
यह खड़ी हो गई है मेरे सामने
माँगती है पल-पल का हिसाब

2
पिता
तुम्हारी मृत्यु
आश्चर्य है
तुम्हें जानती-पहचानती नहीं!

उसे क्या पता कि
तुमने मुझे खुला छोड़ दिया था
खुद मुझे घोड़े पर बिठाकर जंगल की अनिश्चितताओं में
और तुम्हारी अदृश्य जोरदार तालिया पाशर्व से ही
मुझे और मेरे घोड़े का मार्गदर्शन करती रही
उत्साहित करती रहीं ?
ये सब बातें तुम्हारी मृत्यु को पता नहीं
वो तो कहती है जिस घोड़े पर बैठे हो
वो तुम्हारे पिता ने कर्ज लेकर खरीदा था
उसका हिसाब दो !
उनकी जिन तालियों पर इतना फक्र करते हो
उन्हीं हथेलियों से खून की लपटें निकलती थीं
आखिरकार काँटों के चप्पल पहनकर
तालियाँ बजाना कोई खेल तो नहीं
उन लपटों का मूल्य चुकाओ !

मैं अचंभित हूँ
कि कैसे तुम्हारी मत्यु को
तुम्हारी शांत प्रवृत्ति तुम्हारे आचार-विचार
तुम्हारे जीवन जीने की निष्काम प्रवृत्ति आदि की
कोई जानकारी नहीं
उसे तो पता ही नहीं कि जब घर में सैलाब आया था
और उसके साथ बहकर आए
कीड़े-मकौड़े, साँप-बिच्छु
जो तुम्हारे शरीर से चिपक गए थे
और तुम्हारा खून पी रहे थे
तब भी बिना किसी वैमनस्य के
तुम उन्हें वापस उनके घर पहुँचाने के रास्ते
ढूँढते रहे, मुस्कुराकर कहते रहे कि
ये अपने घर का रास्ता भूल गए हैं
इन्हें इनके दु:ख से मुक्त करना है

लेकिन मृत्यु खड़ी हो जाती है मेरे सामने
किसी रंगदार की तरह
जिसे हम सब डायन के रूप में जानते रहे
कमर पर एक हाथ रख
दूसरा हाथ मेरे सामने रखती है, कहती है
उन कीड़े-मकौड़ों, साँप-बिच्छुओं को
उनके घर वापिस पहुँचाने के लिए निकले तुम्हारे पिता
रास्ते भर कई रंगदारों को हफ्ता देते निकले थे -
वो पड़ोसियों-करीबियों के उलाहने
सगे-संबंधियों के ताने
अपने गिरते-पड़ते, टूटते बिखरते आदर्शों का शालीन बोझ
कई ऐसे लोग जिनके लिए वो अब अछूत थे
क्योंकि अब तुम्हारे पिता के बदन पर रेंगते थे कीट-पतंग
उन लोगों का पान की दुकान पर
अपनी बातचीत में मशगूल हो मुँह मोड़ना आदि
जैसे पलों की कीमत चुकाओ!

3
पिता
मैं ठिठकता हूँ, रूकता हूँ
सोचता हूँ
तुम्हारी मृत्यु तुमसे कितनी जुदा है
बचपन में पाई-पाई का हिसाब माँगने वाली दाई
माँ से लड़कर-झगड़कर
दो बार पोंछा लगाने
चार बार कटोरी-गिलास धोने
महीना में एक बार उनकी बदन की मालिश करने की
उलाहना देते हुए दस रुपया, बीस रुपया, पैंतीस रुपया
लेकर गली में बड़बड़ाते हुए जाने वाली
मकान खरीदते वक्त पिता के साथ घूमने वाला प्रॉपर्टी डीलर
अपने कमीशन के लिए खिचखिच करने वाला
जैसे कई चेहरे घूमते हैं मेरे सामने
याद आते हैं अमीर घरानों के गरीब रिश्तेदार
सुसंकृत, शिक्षित, संभ्रांत, यशस्वी पिताओं के
अनपढ़, क्रूर, बेवकूफ व दिग्भ्रमित संतान
बिजलीघरों की चमचमाती रोशनी के पीछे
अंधकार में डूबा हुआ, सोया हुआ गाँव
गंगनचुबी इमारतों के पाँवों पर रेंगती झोपड़पटि्यां
एक स्लार्इड शो की तरह मेरी जेहन में उभरते हैं
मैं सोचता हूँ
शायद कमीशनखोर परछाईं सी
पिता की मृत्यु
इतनी गरीब, भीखमंगी, क्रूर, बीमार और अंधकार में डूबी हुई सी
इसलिए दिखती है
क्योंकि पिता के जीवन की संघर्षों की दिलेर गाथाएँ
मूँछे ताने ताल ठोकते हुए
दिव्यदीपितमान से दमकते हुए खड़े दिखते हैं

4
पिता
मैं हतप्रभ हूँ
और धीरे-धीरे समझ पा रहा हूँ
बोरियत की परते कुछ हटाते हुए कि
तुम्हारी मृत्यु
मेरे और तुम्हारे बीच
आकर खड़ी हो जाने वाली कोई बिचौलिया नहीं
और न ही मृत्यु है कोई आखिरी पड़ाव
या फिर जीवन के कई पड़ावों में एक पड़ाव
बलिक एक पूर्ण जीवन की अपूर्ण लेकिन अभिन्न शर्त है
जो कदम-कदम पर, पल-पल पर घुली-मिली रहती है जीवन में
ठीक उसी तरह
जिस तरह जीवन की आकाँक्षाएँ पसरी रहती हैं
मृत्युरूपी, मृतप्राय, मरणासन्न परिसि्थतियों में
जैसे बीमार के साथ-साथ अस्पतालों में घूमता उसका स्वस्थ भाई
घर पर पड़े अपंग पिता का
रेस की मैदान में तेज-तेज कदमों से दौड़ती हुई उसकी धाविका पुत्री

पिता
मैं तुम्हारी मृत्यु के दावों को
अब सहसा सुनने लगा हूँ कुछ ध्यान से
जिसका एक अंश एक भाव एक रूप
खून-चूसते बिच्छुओं के रूप में
साथ-साथ रहा बसा तुम्हारे जीवन के पलों में
खिलखिलाती धूप में अचानक आए बादलों के अंधकार की तरह
उन संतानों की तरह
जिन्हें नदी की तरह पाल-पोसकर
मुहाने तक ला खड़े करने के बाद
जब समुद्र में कूदने को कहा गया
तब घबराकर उन्होंने वापस मुख कर लिया
और माँ-बाप के साथ डूबने-उपरने की ऊहापोह में कैद हो गये

सचमुच समझने लगा हूँ कि
हर रंगदार के बनने के पीछे
होती है एक लंबी दर्दनाक अनकही-अनसुनी कहानी
और अब मैं तैयार हो चुका हूँ
तुम्हारी असहाय रंगदार मृत्यु के सारे उलाहनों को समझने को
यह कहते हुए कि घोडे़ आदि का कर्ज तत्काल चुकाता हूँ

लेकिन घोड़े से उतरना नागवार है
क्योंकि इससे उतरना
पिता के मन से उतरना होगा
जो शायद उनकी असल मृत्यु होगी

कुमार विक्रम
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