Friday, June 14, 2019

खरे साहब: कुछ नोट्स






(श्री अजेय कुमार द्वारा सम्पादित 'उद्भावना' पत्रिका का अंक १३६ (अप्रैल-जून २०१९) हमारे समय के दिग्गज कवि-आलोचक-अनुवादक-विचारक-पत्रकार-स्तम्भकार- स्क्रिप्ट राइटर - संस्कृति प्रशासक- श्री विष्णु खरे (१९४०-२०१८) पर केंद्रित है. इस अंक में एक लेख मेरा भी है. अगर सही रूप में कहा जाये तो श्री अजेय कुमार ने यह लेख मुझसे लिखवा लिया है क्यूंकि दो महीने की आँख-मिचौली के बाद ही मैं यह लिख पाया--वही पुराण राग मेरा कि फुरसत नहीं निकल पा रहा, कभी यह काम कभी वह काम, कभी यहाँ की दौर और कभी वहां की. साथ ही साथ मन में यह भी था की कुछ अच्छा लिखा जाये, खैर अच्छे-बुरे का तो पता नहीं, लेकिन मैंने उनके साहित्यिक पहलु से अलग जो मुझे उनके साथ काम करने का एक अहम् मौका मिला, उसमे पर ही केंद्रित कर मैंने यह आलेख लिखा. इस अंक में हमारे समय के कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों के लेख सम्मिलित है. उसकी पूरी सूची इस प्रकार है: चंद्रकांत पाटिल, असद ज़ैदी, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, पंकज चतुर्वेदी, हेमंत कुकरेती, सविता सिंह, कात्यायनी, लीलाधर मंडलोई, विजय कुमार, प्रियदर्शन, राजेश जोशी, नीलेश रघुवंशी, कुमार अम्बुज, संजय चतुर्वेदी, जानकीप्रसाद शर्मा, दिनेश श्रीनेत, आनंद स्वरुप वर्मा, परवेज़ अहमद, प्रफुल्ला शिलेदार, रविभूषण, लाल्टू, दिनेश भट्ट, पल्लव, अनीता वर्मा, निशिकांत ठाकर (साक्षात्कार) और हरिमृदुल (साक्षात्कार), सुंदर चंद ठाकुर (कविता) एवं कुछ स्मृतियाँ तथा खरे साहब के कुछ लेख. संपादक अजेयजी को फिर से बधाई. अपना लेख अब यहाँ ब्लॉग पर भी डाल दिया है)                  


खरे साहब: कुछ नोट्स 

अंग्रेज़ी साहित्य के विद्यार्थी होने के नाते एक ऐसी ट्रेनिंग हुई जिसमें कि आप लेखकों से व्यक्तिगत तौर परबाई डिफ़ॉल्ट बहुत दूर रहते हैं. कभी उनसे मुलाक़ात होगी और आप उनके साथ बातचीत करेंगे ऐसाकभी आप सोचते भी नहीं है. इस ट्रेनिंग को कई अर्थों में लिया जा सकता है लेकिन इसका एक अर्थ यहज़रूर है कि आप लेखकों को सिर्फ़ उनकी लेखनी सेउनकी पुस्तकों से  उनकी रचनाओं सेउनकेविचारों से ही  जानते  समझते हैं और आपका उनसे एक रिश्ता बना रहता है और वो कहीं  कहीं आपकेमन मस्तिष्क में अलग अलग ख़ाकों में रहते हैं। 

हाँ लेकिन उनके कुछ व्यक्तिगत जीवन के बारे में आपको अलग अलग जीवनियों में या लोगों के संस्मरणमें या  कुछ अनेक्डॉट्स के रूप में चीज़ें आपके सामने में आती है तो थोड़ा बहुत ‘व्यक्तिगत’ रूप  में आप उनके बारे में जानते रहते हैं 

जैसे कि मुझे याद है जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य से MA कररहा था (१९९४-९६ के दौरान) तो हमारे एक शिक्षक प्रोफ़ेसर विनोद सेना जो कि हमें टीएस एलियट पढ़ाते थेउन्होंने एक बड़ी अजीब बात  एलियट के बारे में कही। वह यह कि एलियट जब कभी किसी विश्वविद्यालय में व्याख्यान के लिए जाते थे तो किसी पत्रकार की इंटरी की मनाही होती थी और यहाँ तक कि व्याख्यान हॉल के सारे खिड़की दरवाज़े भी बंद करवा देते थे क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि उनके व्याख्यान का कोई भी हिस्सा बाहर प्रकाशित हो ताकि वो अपने व्याख्यान को हूबहू किसी दूसरी जगह इस्तेमाल कर पाएँ। इसमें कहीं न कहीं उनका मौद्रिक पक्ष भी काम करता था, ऐसा प्रोफ़ेसर साहब ने हमें बताया। फिर कभी किसी पुस्तक में ऐसा एलियट के बारे में पढ़ने को नहीं मिला और ज़रूर यह उनके बारे में प्रचलित विभिन्न भ्रांतियों व कहानियों- जो कि किसी भी विशिष्ट साहित्यकार के बारे में प्रचलित रहती है- से संबंधित रहा होगा जिसकी जानकारी प्रोफ़ेसर साहब को रही होगी। 

शायद मई 2006 में विष्णु खरे जी नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादकीय सलाहकार के रूप में आए. दरअसलउस वक़्त एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट हमारे सामने था. फ्रैंकफर्ट बुक फेयर (2006) में भारत अतिथि देश केरूप में शामिल होने जा रहा था और ट्रस्ट उस परोजेक्ट की नोडल एजेंसी थी उसकी तैयारी जोरों शोरों से क़रीब 1 साल से ज़्यादा समय से चल रही थी और मैं उस प्रोजेक्ट का सम्पादकीय इंचार्ज था. कई अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ साथ लेखकों के कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी मेरी थी  

खरे साहब संपादकीय सलाहकार के रूप में एक पूरा पैकेज लेकर आए थे। पैकेज इस रूप में कि वो खुद एक नामचीन कवि-साहित्यकार-अनुवादक थे और अंतरराष्ट्रीय पटल पर और अंतरराष्ट्रीय साहित्य की सूझ-बूझ रखने वाले तथा साहित्य एकेडमी में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर कार्य कर चुके थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जर्मनी व वहाँ के भारतीय साहित्य से जुड़े बुद्धिजीवियों से उनका एक ख़ास पुराना रिश्ता था। अंत में यह तथ्य भी अपने आप में महत्वपूर्ण था कि १९८६ में जब फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले में भारत को पहली बार अतिथि देश का दर्जा मिला था तो भारत से गए लेखकों के शिष्टमंडल में वो भी शामिल थे। तो बहुत ही विविध तजुरबे के साथ खरे साहब इस प्रोजेक्ट में शामिल हुए और उनके साथ काम करना मेरे जैसे एक युवा संपादकीय सहायक के लिए एक सुखद मौक़ा व चुनौती भी थी।

लेकिन जैसा कि हमारे प्रोफ़ेसर सेना ने एलियट के बारे में एक अटपटी जैसी सूचना हमें क्लासरूम में दी थी, वैसी सूचना खरे साहब के बारे में मुझे देने वाला कोई नहीं था। यह बाद में जाकर पता चला कि हिंदी साहित्य जगत में लोगों ने कई ऐसे विशेषणों से उन्हें नवाज़ रखा था कि अगर उसकी सूचना मुझे पहले से रहती तो उनके साथ काम करने की बात सुनकर मैं शायद असहज हो गया होता। इस तरह से हम दोनों एक दूसरे को ब्लैंक स्लेट की तरह मिले and we hit off like a great pair! 
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अगला छे महीना एक पागलपन व दीवानगी का दौर रहा। क़रीब १०-१२ घंटे रोज़ हम साथ साथ काम करते रहे जिसमें कई शनिवार और रविवार की छुट्टियाँ भी शामिल रहीं। ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रो बिपीन चंद्रा, निदेशक श्रीमती नुज़हत हसन, संयुक्त निदेशक श्री नरेंद्र सिंह रंधावा के साथ हमलोगों ने प्रोजेक्ट से संबंधित न जाने कितने मुद्दों पर गहन चिंतन मनन किया, शायद १५००-२००० ईमेलों का भारत में अन्य संस्थानों, लेखकों, साहित्यकारों, प्रकाशकों, मंत्रालय, जर्मनी में भारतीय दूतावास, फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले प्राधिकरण, जर्मनी में अन्य साहित्यिक संस्थानों आदि से समन्वय हेतु आदान प्रदान हुआ। इन ईमेलों के कई टेक्स्ट पर सोचविचार कर हमलोग लिखा करते थे। ट्रस्ट की तरफ से तक़रीबन ५० लेखकों का शिष्टमंडल फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले में शामिल हुआ जिसमें हमारे समय के कई दिग्गज लेखक शामिल थे, मसलन, महाश्वेता देवी, यू आर अनंतमूरती, विक्रम सेठ, अमिताभ घोष, दिलीप चित्रे, इंदिरा गोस्वामी, शशि थरूर, रमाकांत रथ, सुधीर कक्कर, गुरदयाल सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, अमित चौधुरी सितांशु यशचंदर, शफ़ी शौक़,निदा फ़ाज़ली, ममांग दाई आदि। इसके अलावा साहित्य अकादमी एवं अन्य प्रकाशकों की तरफ से भी कुछ भारतीय लेखक शरीक हुए थे और कहा जाता है कि एक समय में फ़्रैंकफ़र्ट पुस्तक मेले २००६ के दौरान क़रीब १०० भारतीय लेखक विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हुए जो अपने आप में एतिहासिक रहा। 


In Frankfurt on 10th or 11th October 2006


सबसे बड़ी चुनौती हमारी रही लेखकों के कार्यक्रम कीफॉरमैटिंग व  उनसे मँगवाए गए रीडिंग टेक्स्ट का संचयन ताकि उन्हें जर्मन भाषा में अनुवाद के लिए तैयार करवा लिया जाए। कार्यक्रमों में भारतीय लेखक मुख्यत अपनी भाषा में ही पाठ करते थे और उनके जर्मन भाषा में अनुदित पाठ श्रोताओं के बीच बँटवा दिए जाते थे। यह काफ़ी मशक्क्त का काम था जिसमें हमारी साहित्यिक समझ और लॉजिस्टिक्स का सही समन्वय होना सबसे महत्वपूर्ण था। फ़्रैंकफ़र्ट पहुँच कर लेखकों के साथ व उनके कार्यक्रमों का समन्वय  भी बड़ा काम था जिसे जर्मनी की एक पी आर एजेंसी के सहयोग से बख़ूबी निभाया गया। 

जैसी भ्रांतियाँ खरे साहब के बारे में साहित्यिक हलकों में फैलाई गई थी, उससे बिलकुल दीगर मेरा अनुभव रहा। समय से आना, और काम के प्रेशर को देखते हुए यह मानकर चलना कि शाम में घर जाने का कोई समय नहीं है। एक सलाहकार के रूप में तकनीकी रूप में उनको इतनी लिबरटी थी कि वो एक रेगुलर स्टाफ़ से अलग अपनी दिनचर्या रख सकते थे, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। सरकारी कार्यालय के कामकाजों व नियमों की अच्छी जानकारी थी और साथ ही साथ इसकी समझ भी उसकी सीमाओं के अंदर रहकर भी समयानुसार सही परिणाम देना है। मुझे काम के प्रति उनके इस प्रतिबद्धता से काफ़ी कुछ सीखने को मिल रहा था, हालाँकि वो मुझे अनेक तरह के काम में संलग्न देखने पर कभी कभी अपनी गहरी भारी आवाज़ में पूरी भाव भंगिमा से कहते थे, ‘Kumar, the way you are working is simply out of the world!’ और एक बार मेरे जन्मतिथि को जानकर उन्होंने कहा, ‘अरे तुम तो बिलकुल मेरे बेटे के उम्र के हो’! 
मयूर विहार से उन्हें ग्रीन पार्क आने जाने में दिक्क्त होने लगी। ऑटो काफ़ी किराया ले लेता था। कार्यालय में शाम में देर हो जाने के कारण रात के ८ बजे के बाद ऑफ़िस की गाड़ी एक दो बार उन्हें छोड़ने गई लेकिन नियमानुसार वह सुविधा हमेशा नहीं दी जा सकती थी। खरे साहब कहते थे कि उनकी एक फ़िएट  गाड़ी है जो बॉम्बे में बेटे के पास है और अपनी एक पुरानी स्कूटर को ठीक कराने की समय नहीं निकाल पा रहे थे। लेकिन एक दिन सोमवार की सुबह में उन्होंने मुस्कुराते हुए प्रवेश किया और कहा कि उन्होंने अब स्कूटर ठीक करवा लिया है और आने जाने की समस्या नहीं रहेगी।

 दिन भर के काम में बात आई-गई हो गई। देर शाम में हमलोग कार्यालय से बाहर निकले और जब मैंने देखा कि खरे साहब ने एक पुराने स्कूटर की डिक्की से अपनी हेलमेट निकाली और उसे पहना तो उन्हें देखकर मानो मुझे ऐसा लगा कि वो पल में दिल्ली के आम से भी आमतर व्यक्ति में तब्दील हो गए हों। जब वो स्कूटर पर बैठकर किक मारकर आगे मेन रोड पर हज़ारों गाड़ियों के रेलम पेल में ग़ायब हो गए तो यह सचमुच लगा कि खरे साहब ने जीवन में संघर्ष को इस तरह आत्मसात कर लिया था कि उसका कोई अलग से कोई वजूद नहीं रहा। शायद ही कभी उनको अपनी पारिवारिक व आर्थिक समस्याओं के बारे में आप बात करते हुए पाते। हालाँकि हमारा रिश्ता इतना गहन हो चुका था कि फ़्रैंकफ़र्ट के तीन सप्ताह के प्रवास में रात की गहराइयों और तन्हाईयों में कई बार वो खुले थे जिसकी चर्चा यहाँ करना परासांगिक नहीं है।
शाम में जैसा अमूमन होता ही है हमलोग समोसे खाते थे। ४-४३० के आस पास या उसके कुछ बाद। काम से ब्रेक लेने का कारण भी बनते थे समोसे और चाय। उसी दौरान एक दिन समोसे खाते खाते उन्होंने कहा कि शुगर का टेस्ट कराया था और फिर हँसी में बात बदल दी। मैंने कहा कि तब समोसा कम कर देते हैं। खरे साहब ने अपनी चिरपरिचित अंदाज में कहा ‘अरे, देखा जाएगा।’ 

उन्हीं दिनों एक बार टाईम्स ऑफ़ इंडिया में एक रपट छपी जिसमें यह ज़िक्र था कि समोसा को विश्व के सबसे ज़हरीले स्नैक में एक माना गया है। उस रिपोर्ट में पिज़्ज़ा, बरगर आदि का भी ज़िक्र था। 

दोपहर में खाना खाते हुए मैंने पूछा कि आज आपने टाईम्स में समौसा-संबंधी रिपोर्ट पढ़ी है? उन्हें बात सुनते ही दिलचस्प लगी। हँसते हुए पूछे, ‘अरे, क्या?’ मैंने लाईब्रेरी से पेपर मँगवा कर वह रिपोर्ट खोलकर उनके सामने रख दिया जिसमें साइंस वाले पेज पर बिलकुल उपर में ही लिखा था, ‘ Samosa among the most poisonous snacks of the world’, या फिर ऐसा ही कुछ। वो तुरंत पूरा पढ गए और थोड़ा गंभीर भी हो गए। हमलोगों ने फिर समोसे के बनने की प्रक्रिया पर थोड़ी देर बात-चीत की कि कैसे प्रायः उन्हें उसी पुराने जले हुए तेल में बार-बार तला जाता है जो निश्चिततः स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होता होगा। रिपोर्ट का हम पर गहरा असर पड़ा। उस दिन हमलोगों ने समोसा नहीं खाया। लेकिन एक-दो दिनों के बाद स्वाभाविक रूप से फिर से समोसे हमने खाना शुरू कर दिया। 
एक बार डरते डरते मैंने उन्हें कहा कि मैं कुछ कविताएँ भी लिखता हूँ-अंग्रेज़ी व हिंदी दोनों में। उन्होंने मेरी झिझक को समझ लिया और कहा कि ‘Mangalesh has briefed me about you’! मंगलेश डबराल भी उन दिनों ट्रस्ट में सलाहकार के तौर पर आए थे और उन्होंने मेरी अंग्रेज़ी की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद ‘पहल’ के लिए किया था जिसके लिए मैं आज तक उनका आभारी हूँ। फिर मेरी हिंदी की कुछ कविताएँ एक पत्रिका में छपी और मैंने खरे साहब को झिझकते हुए पढ़ने के लिए दिया। दिनभर बीत गया और उनकी कोई टिप्पणी नहीं आई। दिन का भोजन हम साथ ही करते थे लेकिन उस वक्त भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। मेरी उत्सुकता बढ़ती गई और शाम के क़रीब ५ बजे मैंने पूछ ही लिया, ‘ कविताएँ आप पढ पाए क्या?’ उन्होंने कहा, ‘ वो तो मैंने सुबह में ही पढ ली थी!’ मैंने पूछा, ‘कुछ है उनमें?’ खरे साहब ने कहा, ‘ है! बिल्कुल है!’ फिर हँसते हुए कहा कि बड़ी अजीब बात है कि जिन लोगों ने खरे की कविताएँ नहीं पढ़ी हैं उनपर भी कुछ प्रभाव है!’ कविताएँ मेरी गद्यातमक धारा की थी और शायद इसीलिए उन्होंने ऐसा कहा। उसके बाद कविताओं पर उनकी टिप्पणी आती रहती थी। एक बार ‘जनसत्ता’ मेरी दो कविताएँ प्रकाशित हुई जिन्हें उन्होंने पढ़ा और ईमेल पर ये शब्द लिखकर भेजे-‘दोनों कविताएँ अच्छी निकाल लाए हो। अंग्रेज़ी में लिखते रहो लेकिन मैं तुम्हारा भविष्य हिंदी में देख रहा हूँ’
ट्रस्ट से जाने के बाद क़रीब १२-१३ वर्षों तक उनसे ईमेल पर लंबी लंबी बात चीत होती रही। उनके साथ एक बार कविता पाठ करने का मौक़ा मिला। दरअसल उन्होंने २००७ में एक ईंडो-एस्टोनियन साहित्यिक समिति का गठन किया और उसकी पहली गोष्ठी एस्टोनिया के प्रसिद्ध कवि यान कापालांसिकी के आगमन पर आईआईसी, नई दिल्ली में अक्टूबर महीने में हुई। उस समिति की कार्यकारिणी में मुझे भी रखा। श्री केदारनाथ सिंह, श्री मंगलेश डबराल, श्री अजय कुमार और खरे साहब उसके संस्थापक सदस्य थे। मैंने दो अंग्रेज़ी की कविताएँ पढ़ीं। देवी प्रसाद मिश्र ने पाठ के बाद बधाई दी और कहा कि काफ़ी सशक्त कविताएँ थीं आपकी! लेकिन सबसे दिलचस्प टिप्पणी खरे साहब से अगली सुबह फ़ोन पर मिली जब उन्होंने कहा कि ‘भई मेरी पत्नी कह रही थीं कि सबसे ज़्यादा उन्हें तुम्हारी कविताएँ पसंद आईं।’ यह अफ़सोस है कि खरे साहब के काफ़ी बार कहने पर भी अपना कोई संग्रह  अब तक नहीं निकाल पाया। 

January 2007 at IIC in New Delhi; seated on dais from left: Vishnu Khare,
Ajey Kumar, Jaan Kapalinski, Mangalesh Dabral; myself reading poems


२५ फ़रवरी-४ मार्च २०१२ के नयी दिल्ली पुस्तक मेले में हमलोगों नस थीम 'भारतीय सिनेमा के १०० वर्ष'को केंद्रित कर रखी थी. इस मौके पर, कई अन्य कार्यक्रमों में 'साहित्य और सिनेमा' विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में ट्रस्ट की तरफ से विष्णु खरे और ज़ुबैर रज़वी के बीच एक संवाद आयोजित करने  का भी मुझे अवसर मिला. 'उद्भावना' के संपादक अजेय कुमार ने इस कार्यक्रम का सञ्चालन किया। साहित्य और सिनेमा के बीच के सामजस्य पर बात होते होते इस पर भी पहुंची की बॉलीवुड सिनेमा ने हिंदी व् उर्दू को सहेज कर रखने और उसे प्रचारित करने में बड़ी भूमिका निभायी। हालाँकि खरे साहब इस बात को लेकर काफी चिंतित दिखे क़ि समकालीन समय के ज़्यादातर फ़िल्मी अदाकार स्क्रिप्ट रोमन लिपि में पढ़ते हैं क्यूंकि वे देवनागरी लिपि में हिंदी नहीं पढ़ सकते. उनकी चिंता थी कि बोलचाल की हिंदी तो सिनेमा से प्रभावित होती रही है लेकिन वो हिंदी साहित्य और भाषा में कोई गंभीर योगदान कर पा रही है या नहीं यह बहस का विषय है. 


अक्टूबर २०१३ में मुझे उनसे अपने ब्लॉग के लिए एक साक्षात्कार लेने का मौका मिला। दरअसल उन दिनों एस्तोनिया के महाकाव्य 'कलेवपुत्र'के हिंदी अनुवाद के लिए उन्हें एस्तोनिया का the State Decoration of the Order of the Cross of Terra Mariana, IV Class से नवाजा गया था जिसके पुरस्कार समारोह में मैं भी शामिल हुआ.  यह साक्षात्कार आप ब्लॉग पर पूर्ण रूप  पढ़ सकते हैं।  सबसे जो चकित करने की बात उन्होंने कलेवपुत्र के लिए कही वह यह था की हम उसे भारतीय परिपेक्ष में दलित-आदिवासी-लोक परंपरा के तौर पर देख सकते हैं, न की महाभारत या रामायण सरीखे महाकाव्य के रूप में. उस ब्लॉग पर उनकी द्वारा अनुदित हिंदी महाकाव्य के कुछ पंक्ति भी उद्धृत थे जिन्हे मैं यहाँ आप सबों के समक्ष रखना चाहूंगा. 

मृत्यु की बेड़ियों में कलेवपुत्र ने संघर्ष किया
            यातना में अपना प्राण-त्याग किया.
            खेतों में रक्त जम गया
            घटनास्थल को लोहित रँगता हुआ.
            उसका शरीर पहले ही कड़ा और ठंढा हो चुका था,
            रक्तस्राव शांत हुआ,
            उसका ह्रदय निस्पंद.
            तब भी कलेवपुत्र की आँखें
            स्वर्ग के पिता के कक्षों की ओर
            स्पष्ट दमक रही थीं,
            ऊपर पुरातनपुरुष के आगारों की ओर.

                        अपने नश्वर बंधनों से मुक्त
            उसकी आत्मा उड़ी, एक दीप्तिमान पक्षी की भाँति
            वारिदों में विस्तीर्ण पंखों पर,
            वह स्वर्ग को आरोहित हुई.
            उसकी आत्मा की प्रच्छाया बनने के लिए स्वर्ग में
            एक स्वस्थ शरीर को निर्मित किया गया
            जो दैवी नायकों की क्रीड़ाओं पर,
            गर्जनकारों के भोजों पर,
            मधुरतर जीवन का स्वाद ग्रहण करता हुआ
            और अपने पार्थिव परिश्रम से विश्राम करता हुआ
            अपना हर्षनाद करता था.
            वह एक खुले अलाव के पास बैठा,
            तारा के नायकों के बीच,
            अपना सिर अपने हाथों पर टिकाए हुए,
            गायकों के कथाओं को सुनता हुआ;
            उसने अपने पार्थिव पराक्रमों को सुना
            जीवंत घटनाओं और अचंभों को
            अग्नि के पास वार्तालाप में –
            चारणों की स्वर्णजिव्ह चर्चा में.


बातें और स्मृतियाँ इतनी हैं कि शायद एक मोनोगराफ मैं कभी खरे साहब पर लिखूँ जिसमें उनकी कुछ कविताएँ जो मैंने अंग्रेज़ी में अनुदित कर रखी हैं वो भी शामिल कर पाऊँ। 

वो मेरी पुत्री सिया के प्रथम वर्षगाँठ पर २०१० में आए थे और परिवार के सभी सदस्यों से मिल पाए। अपनी बात मैं यहाँ मेरे पिता के निधन पर लिखे मेरे ब्लॉग पर आई उनकी लंबी टिप्पणी से ख़त्म करूँगा। दरअसल २०११ में अपने पिताजी के मृत्यु पर मैंने अंग्रेज़ी में एक लंबा लेख अपने ब्लॉग पर लिखा और उन्हें भी लिंक भेज दिया। उस लेख में Dylan Thomas और उनके उपर मेरे पिता के unfinished research work  की चर्चा मैंने की थी। दरअसल उस लेख में Dylan Thomas की कविता जो उन्होंने अपने पिता की मृत्यु पर लिखी थी उसपर भी चर्चा थी। वह कविता है: Do Not Go Gentle Into That Good Night.

उनकी अंग्रेज़ी में ही लिखी बड़ी लंबी टिप्पणी आई और उसमें उन्होंने Dylan Thomas, उनकी उस कविता पर  और फिर अपने पिता पर भी लिखा। शुरूआत में ही उन्होंने लिखा: Your father and I both are 1940-born...’

अपनी इस टिप्पणी में उन्होंने यह भी ज़िक्र किया कि इस कविता में ‘rage’ शब्द का कोई समकक्ष हिंदी शब्द ढूँढना प्रायः नामुमकिन सा रहा है क्योंकि ‘कुपित/नाराज़/ग़ुस्सा मत हो/न हो’ आदि सही नहीं लगते।’ 

अभी भी ब्लॉग पर वह लंबी टिप्पणी आप पढ सकते हैं।



--कुमार विक्रम 

Sunday, December 16, 2018

Typo-A Poem




Typo-A Poem



A letter or a word
Gone off track 
May be the whole para
May be the whole document
I can accept them all
Life is short 
But not that short indeed

We can always correct
Withdraw, revisit
Words written or spoken
Consciously or out of habit 
If it helps.

But dear friend
How do you correct
The whole life
The whole civilisational discourse 
Based on 
Or synonymous with 
Typo

Kumar Vikram



Wednesday, October 3, 2018

Ándhere Band Kamre': Random Notes







ANDHERE BAND KAMRE: RANDOM NOTES

Ándhere Band Kamre' is surely one of my all time favourite books in Hindi. I consider it an artistically successful and psychologically sustaining story of the odd-even couple Harbans and Nilima. It was first published in 1961, and later translated by the immensely prolific translator, Jai Ratan, into English under the title ‘Lingering Shadows’. 57 years hence, I wonder how much Indian male has moved from being a Harbans, and how much genuinely liberated Indian female are, which Nilima wants to be in the novel.


One of the best things about the novel is long passages of narration in sort of stream-of-consciousness mode which read like poetry. Surely we have read many in English modernist phase, but read in Indian context and in Hindi, they really make powerful impact.

Mohan Rakesh(1925-1972)
These poetic passages are sort of better than what we find in Nirmal Verma because in Verma poetic idiom becomes more overriding than its intention, whereas in this novel of Mohan Rakesh, they seem to stem more from the psychological treatment of the characters and the novelist seems to have better control over them.

--Kumar Vikram

(this is a developing story...)

Friday, September 7, 2018

मौन शब्द




मौन शब्द

जीवन हम जीतना बाहर जीते हैं
उससे कई ज़्यादा
हम अपने अंदर बसते हैं
जहाँ अनकहे, अनगढ़ शब्दों का
अथाह मौन दरिया है
जिसमे डूबना है
खुद को खोकर
खुद को पाना है
शब्द कर जाते हैं दगा हमसे
हमारे मुख से चोरी छिपे निकल जाते हैं
जैसे हम बचपन की दुपहरिया में
भाग जाते थे खेलने
और माँ घर घर ढूंढ़ती फिरती थी हमें
मानो हम उसके सहेजे हुए शब्द हों
जिन्हे सोच समझ कर उसे बोलना है
और तभी शाम में तैयार कर
काजल, टिका, स्वेटर पहना कर ही
बाहर भेजा करती थी
शायद कुछ वैसे ही
जैसे गहरे मौन की दरिया में डूबकर
शब्द निकलते हैं हमारे
प्यारे मासूम बच्चों की तरह
आत्मीय, आश्वस्त, नम्र और उदार    

कुमार विक्रम
०७/०९/१८

Tuesday, August 21, 2018

सौम्या और आदित्य: पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक (भाग २)







सौम्या और आदित्य

(पहले सीरियस प्यार की पहली सीरियस कसक-भाग २)

काजल सौम्या की बचपन की दोस्त है. दो जिस्म एक जान टाईप्स।  दोनों बचपन से ही साथ साथ बढे-पढ़े--पड़ोसी, स्कूल की सहपाठिन, अब कॉलेज में एक साथ, दोस्त, बहन, दुश्मन सबकुछ. काजल पिछले दो वर्षों से देख रही है कि सौम्या और आदित्य एक दूसरे से मिलते हैं ज़रूर लेकिन सौम्या ने आदित्य और अपने बीच में एक लकीर सी खींच रखी है. काजल को यह बात नहीं खटकती अगर सौम्या आदित्य के प्रति उदासीन होती और उनकी दोस्ती बस क्लास्मेट्स की तरह होती. लेकिन काजल को पता था कि सौम्या को भी आदित्य का इन्तेज़ार रहता था और आदित्य के कॉलेज छोड़ जाने के बाद सौम्या  का यह पक्ष थोड़ा खुल कर सामने आ रहा था.

आज काजल ने सौम्या को कैंटीन में सॉफ्ट ड्रिंक पीते हुए टोक ही दिया। 

काजल: तुमने आदित्य को इस तरह से टांग कर क्यों रखा हुआ है? 

सौम्या: टांग कर? ये क्या बात हुई?

काजल: हां, तो और क्या कहेंगे? इतने दिनों से तुम उससे मिल रही हो, पर क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने उसे यह जताने की कोशिश नहीं की हो कि तुम उससे मिलती हो क्यूंकि वो मिलना चाहता है, न कि तुम?

सौम्या: वेल, काफी हद तक तो यह सही भी है!

काजल: अगर ऐसा है तो तुम उससे मिलना छोड़ दो. कहो तो मैं ही कह देती हूँ उसे कि तुम अब सौम्या से मिलना बंद कर दो क्यूंकि वो तुमसे मिलना नहीं चाहती.

सौम्या (मुस्कुराते हुए): मुझे लग रहा है कि तुम्हारी उसपर नज़र है! 

काजल: बिलकुल नज़र है. उस पर नहीं. तुमपर। मुझे साफ़ दिख रहा है कि  तुम अपने आप से भाग रही हो. समय तेजी से बदलता है और हमें पता भी नहीं चलता है वो कब बदल जाता है. इससे पहले कि तुम आदित्य को खो बैठो, तुम कुछ सीरियस हो जाओ. 

(करीब दो मिनट की शांति, जिसमे कैंटीन का शोर शराबा काजल और सौम्या के बीच के संवाद को एक नयी दिशा देने में सहायक होता है) 

काजल: कास्ट? ईज़ दैट योर प्रॉब्लम? 

सौम्या: व्हाट कास्ट? इट डज़न्ट बोदर मी! 

काजल: सिर्फ तुम्हारे बोदर नहीं होने से क्या होगा? यू नो, व्हाट आई मीन. योर फैमिली एंड ऑल दैट. 

सौम्या: अरे, थोड़ा रुक जा! आज तो तू बिलकुल घोड़े पर ही बैठ गयी है. इतनी दूर सोच कौन रहा है? माय कंसर्न इज़ डिफरेंट। वो बिज़नेस करता है और मैंने आजतक अपने घर में किसी बिज़नेस वाले को देखा नहीं है. उनके बारे में हमलोगों के कुछ अपने पर्सेप्शन्स हैं. सही या गलत--ये तो पता नहीं।  लेकिन नौकरी करने वालों की उपब्रिंगिंग और बिज़नेस वालों में फर्क होता है.

काजल: यह सिर्फ देखने का एक नजरिया है. अब मेरा ही भैया बिज़नेस करने लगे है. हमारे भी घर में आजतक किसी ने बिज़नेस में हाथ नहीं लगाया. बट गॉड विल्लिंग, टुडे ही इज़ डूईंग वेल.

सौम्या: मैं शायद तुम्हे पूरी तरह से नहीं समझा पा रही हूँ. मेरे मन में कहीं न कहीं अपर्णा दी का केस घूमता रहता है. 

काजल: ओफ़ो! फिर वही बात! कोई ज़रूरी नहीं कि जो उनके साथ हुआ वो तुम्हारे साथ भी हो जाये. 

सौम्य: देखो कितना अच्छा चल रहा था उनका. अपने मन से अपर्णा दी ने संजीव भाई साहब से शादी की. कोई कास्ट-वास्ट का चक्कर भी नहीं था. अच्छा खासा उनका चाइनीज़ फर्नीचर का बिज़नेस था. फिर एक बार उनके पार्टनर ने धोखा दे दिया। और फिर तो जैसे सबकुछ ताश के पत्तों की तरह बिखर सा गया. अपर्णा दी के ससुराल से बिज़नेस के लिए पैसों की डिमांड आने लगी. फुआ और फूफाजी ने जहाँ तक हो सका किया। लेकिन एक अजीब तरह का टेंशन परिवारों में रहने लगा. सबसे तो आश्चर्य अपर्णा दी और संजीव भाई साहब के रिश्ते में आये बदलाव पर मुझे होता है. ऐसा लगता है जैसे वह रिश्ता भी चाइनीज़ ही था जिसने अपनी चमक यकायक खो दी. 

(अब तक दोनों कॉलेज की कैंटीन से निकल कर बस स्टॉप पर आ गए थे और घर जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहे थे) 

काजल: मुझे कभी कभी लगता है कि ज़्यादातर रिश्ते खोखले ही होते है, लेकिन चूंकि उनपर 'मेड इन इंडिया' का स्टाम्प होता है इसीलिए उनका पता नहीं चलता है. 

सौम्या: हूँ... शायद 

काजल: लेकिन जब तुम इतना कुछ सोचती रहती हो, तो फिर आदित्य से फ्रैंक बात ही कर लो

(इसी बीच उनकी बस आ जाती है और बस पकड़ने की जल्दी और उसके अंदर की भीड़-भड़क्का ने सौम्या को काजल के इस सवाल का उसी वक़्त जबाब देने से बचा लिया। वैसे भी सौम्या को अभी यह खुद को समझाना था कि कहीं आदित्य के बिज़नेस प्रोफ़ेशन के बारे में उसका डर उसके प्रति अपनी भावनाओं को ढकने का महज़ एक मुखौटा तो नहीं) 

-कुमार विक्रम 

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